बिना सत्यापन हमला करना सही नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने सौरव दास-अशुतोष रांका से गौरव भाटिया पर पोस्ट हटाने को कहा
Amir Ahmad
10 Sept 2026 12:17 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और अशुतोष रांका से भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेता और सीनियर वकील गौरव भाटिया के खिलाफ किए गए सोशल मीडिया पोस्ट खुद हटाने पर विचार करने को कहा।
कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि बिना वेरिफिकेशन किसी पर इस तरह हमला करना सही नहीं है। हालांकि कोर्ट ने फिलहाल पोस्ट हटाने का आदेश जारी करने के बजाय दोनों नेताओं से इस बारे में निर्देश लेने को कहा।
जस्टिस तुषार राव गेडेला भाटिया की मानहानि याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। याचिका में सीजेपी के अभिजीत दिपके, सौरव दास और अशुतोष रांका को पक्षकार बनाया गया।
मामला पांच सितंबर को X पर सौरव दास और अशुतोष रांका की ओर से किए गए एक पोस्ट से जुड़ा है। यह पोस्ट CJP के एक किशोर प्रदर्शनकारी से कथित मारपीट के आरोपी स्वतंत्र भारद्वाज की गिरफ्तारी के बाद किया गया।
भाटिया का आरोप है कि संबंधित पोस्ट कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार किया गया और उसमें उनके नाम से झूठा बयान जोड़ा गया। याचिका के अनुसार, पोस्ट में यह गलत तरीके से दिखाया गया कि भाटिया ने स्वतंत्र भारद्वाज को 'दिमागी नक्सली' और 'जातिवादी' कहा था।
सुनवाई की शुरुआत में कोर्ट ने कहा कि CJP के अभिजीत दीपके के खिलाफ कोई आरोप नहीं है। दीपके की ओर से पेश वकील निखिल गांधी ने उन्हें मामले से हटाने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि दिपके की ओर से ऐसा कोई पोस्ट नहीं किया गया और याचिका में मांगी गई राहत भी मुख्य रूप से सौरव दास और अशुतोष रांका के खिलाफ है।
इस बीच कोर्ट ने दास और रांका से कहा कि विरोध जताने के अलग-अलग तरीके होते हैं। दोनों युवा हैं और उनकी अपनी चिंताएं हो सकती हैं, लेकिन बिना सत्यापन किसी पर इस तरह हमला करना उचित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यदि वे अपनी ओर से पोस्ट हटाने को तैयार हैं तो वे इस बारे में अपना जवाब दाखिल करें, क्योंकि कोर्ट फिलहाल पोस्ट हटाने का आदेश जारी नहीं करना चाहता।
सौरव दास की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि संबंधित पोस्ट पहले ही हटा दिया गया। इस पर कोर्ट ने कहा कि इसके अलावा भी कुछ सामग्री पोस्ट की गई। कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है लेकिन कई बार बात को अधिक स्पष्ट और संयमित तरीके से रखना जरूरी होता है ताकि उसका आशय सही तरीके से सामने आए।
कोर्ट ने गौरव भाटिया से भी कहा कि इस विवाद को अदालत में लाने के बजाय मामले को दूसरे तरीके से सुलझाने की कोशिश की जा सकती थी। इस पर भाटिया ने कहा कि यह गंभीर मानहानि का मामला है और पोस्ट के लाखों अनुयायियों तक पहुंचने के कारण उनकी छवि को नुकसान हो रहा है। उन्होंने कहा कि उन्होंने दूसरे पक्ष को पहले मौका दिया।
भाटिया ने यह भी आरोप लगाया कि दूसरी ओर ऐसा व्यक्ति है, जो तस्वीरों में हेरफेर कर उन्हें समाचार एजेंसी के चिह्न के साथ प्रसारित करता है ताकि उन्हें विश्वसनीयता मिले।
इस पर कोर्ट ने पूछा कि CJP और अभिजीत दीपके को मामले में पक्षकार क्यों बनाया गया और उन्होंने आखिर क्या किया। दिपके के वकील ने दोहराया कि उनके मुवक्किल की ओर से एक भी संबंधित पोस्ट नहीं किया गया।
भाटिया ने हालांकि कहा कि मामला केवल एक-दो पोस्ट तक सीमित नहीं है और इसके पीछे एक ऐसा पूरा तंत्र है, जो शिकायत करने वाले व्यक्ति को निशाना बनाता है। उन्होंने कहा कि उनकी शिकायत पर भी उनसे कहा जा रहा है कि वे आलोचना स्वीकार करें।
कोर्ट ने कहा कि वह पहले ही प्रतिवादियों को सलाह दे चुका है और उन्हें खुद पोस्ट हटाने पर विचार करने को कहा। इसके बाद मामले को कुछ समय के लिए स्थगित करते हुए पीठ ने दास और रांका के वकील से कहा कि वे अपने मुवक्किलों से निर्देश लेकर लौटें।
कोर्ट ने कहा,
“आप युवा हैं, आपके सामने लंबा रास्ता है। अदालतों में समय क्यों बिताना चाहते हैं?”
भाटिया ने दो करोड़ रुपये की मानहानि का मुकदमा दाखिल किया। उनका आरोप है कि CJP और उसके नेता लगातार ऐसे सार्वजनिक बयान और प्रकाशन कर रहे हैं, जिनका उद्देश्य उनकी प्रतिष्ठा के साथ-साथ न्यायपालिका की गरिमा, अधिकार और संस्थागत प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना है।
याचिका में विशेष रूप से सौरव दास के कुछ पुराने सोशल मीडिया पोस्ट का भी उल्लेख किया गया। भाटिया का आरोप है कि दास ने दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा द्वारा आबकारी नीति मामले में CBI की चुनौती की सुनवाई से खुद को अलग नहीं करने को लेकर उन पर हमला किया। याचिका में उमर खालिद की जेल में बंदी को लेकर दास के पोस्ट का भी हवाला दिया गया।
भाटिया का कहना है कि ये टिप्पणियां किसी खास न्यायिक आदेश की निष्पक्ष आलोचना की सीमा से आगे जाकर न्यायपालिका की संस्थागत प्रतिष्ठा को निशाना बनाती हैं। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि CJP एक अपंजीकृत संगठन के रूप में सोशल मीडिया का इस्तेमाल न्यायपालिका पर व्यापक और अपमानजनक टिप्पणियों के लिए कर रही है।


