केवल दिल्ली में आदेश पारित होना रिट क्षेत्राधिकार के लिए पर्याप्त नहीं: दिल्ली हाइकोर्ट ने निवारक हिरासत को चुनौती देने से किया इनकार
Amir Ahmad
14 Jan 2026 3:13 PM IST

दिल्ली हाइकोर्ट ने नशीले पदार्थों की अवैध तस्करी से संबंधित कानून के तहत पारित निवारक हिरासत आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार किया।
हाइकोर्ट ने कहा कि भले ही संबंधित आदेश दिल्ली में पारित हुआ हो और तकनीकी रूप से उसके पास क्षेत्राधिकार मौजूद हो, लेकिन इस मामले में वही उपयुक्त मंच नहीं है जहां इस विवाद का निस्तारण किया जाना चाहिए।
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस मनोज जैन की खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि निवारक हिरासत का आदेश दिल्ली में पारित हुआ, लेकिन जिन आपराधिक मामलों के आधार पर यह आदेश दिया गया, वे सभी पश्चिम बंगाल में दर्ज हैं और वहीं लंबित हैं। ऐसे में “फोरम कन्वीनियंस” के सिद्धांत के अनुसार इस याचिका पर दिल्ली हाइकोर्ट को विचार नहीं करना चाहिए।
हाइकोर्ट ने कहा कि क्षेत्राधिकार के अस्तित्व पर कोई विवाद नहीं है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या अदालत को अपने विवेकाधीन अधिकार का प्रयोग कर इस याचिका पर सुनवाई करनी चाहिए।
अदालत के अनुसार, केवल इस आधार पर कि आदेश दिल्ली में पारित हुआ, याचिका पर सुनवाई करना आवश्यक नहीं हो जाता।
यह याचिका एक बंदी की ओर से उसकी पत्नी द्वारा दाखिल की गई, जिसमें 20 मार्च, 2025 को पारित निवारक हिरासत आदेश रद्द करने की मांग की गई।
केंद्र सरकार की ओर से प्रारंभिक आपत्ति उठाते हुए कहा गया कि बंदी के खिलाफ जिन मामलों को आधार बनाकर हिरासत का प्रस्ताव तैयार किया गया, वे पश्चिम बंगाल में दर्ज हैं, वहीं से हिरासत का प्रस्ताव भेजा गया और उससे संबंधित सभी रिकॉर्ड भी वहीं उपलब्ध हैं।
सरकार ने दलील दी कि केवल इसलिए कि हिरासत आदेश और बंदी की अभ्यावेदन की अस्वीकृति दिल्ली में हुई, यह आवश्यक नहीं कि दिल्ली हाइकोर्ट इस मामले में अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करे।
वहीं याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि चूंकि कारण-कार्रवाई का एक हिस्सा दिल्ली में उत्पन्न हुआ, इसलिए याचिका सुनवाई योग्य है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाइकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता से संबंधित आपराधिक पृष्ठभूमि, मामले के तथ्य और सभी प्रासंगिक दस्तावेज पश्चिम बंगाल में स्थित हैं।
इसके अलावा, याचिकाकर्ता यह भी नहीं बता सका कि उसने दिल्ली हाइकोर्ट के क्षेत्राधिकार को क्यों आमंत्रित किया।
हाइकोर्ट ने यह भी दोहराया कि संविधान के अनुच्छेद 226(2) के तहत क्षेत्राधिकार होना मात्र एक सक्षम प्रावधान है और इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत हर उस याचिका पर सुनवाई करने के लिए बाध्य है, जिसमें कारण-कार्रवाई का कोई छोटा या गौण हिस्सा उसके क्षेत्र में उत्पन्न हुआ हो।
इन कारणों से दिल्ली हाइकोर्ट ने अपने विवेकाधीन रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने से इनकार कर दिया और याचिका का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्ता को उपयुक्त मंच पर जाने की स्वतंत्रता प्रदान की।

