कंडोम के प्रयोग और समयांतराल से दुष्कर्म मामलों में DNA असंगति की हो सकती है व्याख्या: दिल्ली हाइकोर्ट

Amir Ahmad

7 Jan 2026 2:54 PM IST

  • कंडोम के प्रयोग और समयांतराल से दुष्कर्म मामलों में DNA असंगति की हो सकती है व्याख्या: दिल्ली हाइकोर्ट

    दिल्ली हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दुष्कर्म के मामलों में यदि DNA का मिलान नहीं होता है तो मात्र इसी आधार पर अभियोजन का मामला कमजोर नहीं माना जा सकता बशर्ते परिस्थितियाँ उस असंगति की उचित व्याख्या करती हों।

    हाइकोर्ट ने कहा कि अभियुक्त द्वारा कंडोम के प्रयोग और मेडिकल जांच में हुए विलंब जैसे कारण DNA न मिलने की स्थिति को समझा सकते हैं।

    जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने नाबालिग से बार-बार दुष्कर्म के दोषी ठहराए गए व्यक्ति की आपराधिक अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

    हाइकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि न्याय विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट में अभियुक्त और पीड़िता के DNA का मिलान नहीं होना एक महत्वपूर्ण तथ्य है, लेकिन पीड़िता ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के अंतर्गत दिए गए बयान में स्पष्ट रूप से कहा था कि अभियुक्त कंडोम का प्रयोग करता था। यह तथ्य वीर्य की अनुपस्थिति और DNA के न मिलने की स्थिति को स्पष्ट करता है।

    हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि घटना 18 और 19 जुलाई 2018 की रात लगभग तीन बजे से पहले की बताई गई थी। पीड़िता के लापता होने की सूचना दोपहर बाद पुलिस को दी गई और अगले दिन लगभग ग्यारह बजे पीड़िता को अस्पताल ले जाया गया, जहां दोपहर करीब दो बजे चिकित्सकीय परीक्षण किया गया। घटना और मेडिकल जांच के बीच हुए इस समयांतराल को देखते हुए डीएनए का न मिलना स्वाभाविक है और इससे अभियोजन का मामला संदिग्ध नहीं होता।

    मामले के अनुसार अभियुक्त ने तेरह वर्षीय पीड़िता के साथ सात दिनों तक बार-बार दुष्कर्म किया। आठवें दिन पीड़िता की नानी ने अभियुक्त को रंगे हाथों पकड़ा, जो स्वयं भी इस घटना की प्रत्यक्षदर्शी थीं।

    ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 की उपधारा 2 और धारा 506 की उपधारा 2 तथा बाल लैंगिक अपराधों से संरक्षण अधिनियम, 2012 की धारा 5 के अंतर्गत दोषी ठहराते हुए धारा 6 के तहत बारह वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

    दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखते हुए दिल्ली हाइकोर्ट ने कहा कि DNA रिपोर्ट का अनिर्णायक होना अभियोजन द्वारा प्रस्तुत सुसंगत और विश्वसनीय साक्ष्यों को कमजोर नहीं करता।

    हाइकोर्ट ने कहा कि पीड़िता की गवाही को संपूर्णता में देखा जाना चाहिए। इस मामले में पीड़िता की गवाही न केवल सुसंगत रही, बल्कि तेरह वर्ष की कम आयु होने के बावजूद उसने जिरह की कसौटी पर भी स्वयं को विश्वसनीय सिद्ध किया।

    इन आधारों पर हाइकोर्ट ने अभियुक्त की अपील को खारिज कर दिया।

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