DHJS 2026: दिल्ली हाईकोर्ट ने परीक्षा के सवालों को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की, कहा- गलती स्पष्ट और प्रत्यक्ष होनी चाहिए

  • DHJS 2026: दिल्ली हाईकोर्ट ने परीक्षा के सवालों को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की, कहा- गलती स्पष्ट और प्रत्यक्ष होनी चाहिए

    दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा (DHJS) प्रारंभिक परीक्षा 2026 के दो सवालों को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की। कोर्ट ने कहा कि उत्तर कुंजी में तभी हस्तक्षेप किया जा सकता है, जब गलती इतनी स्पष्ट और प्रत्यक्ष हो कि उसे साबित करने के लिए किसी अनुमान या तर्क-वितर्क की जरूरत न पड़े।

    जस्टिस अवनीश झिंगन और जस्टिस अरुण भारद्वाज की खंडपीठ 26 जुलाई को आयोजित डीएचजेएस प्रारंभिक परीक्षा के प्रश्नपत्र श्रृंखला 'डी' के सवाल नंबर 8 और 51 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने दोनों सवाल हटाने और इसके परिणामस्वरूप अपने अंकों की दोबारा गणना करने की मांग की थी।

    कोर्ट ने गौर किया कि मॉडल उत्तर कुंजी 28 जुलाई को जारी की गई और अभ्यर्थियों को आपत्तियां दर्ज कराने के लिए तीन दिन का समय दिया गया। याचिकाकर्ता ने इन दोनों सवालों पर कोई आपत्ति नहीं उठाई, जबकि अन्य अभ्यर्थियों ने ऐसा किया।

    आपत्तियों पर विचार करने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित की गई। उसकी सिफारिशों को 12 अगस्त को हाईकोर्ट की एक समिति ने स्वीकार कर लिया। कुल 11 सवालों को हटाया गया लेकिन याचिकाकर्ता की ओर से चुनौती दिए गए दोनों सवालों पर आपत्तियां खारिज कर दी गईं।

    इसके बाद 14 अगस्त को परिणाम घोषित होने पर याचिकाकर्ता ने कोर्ट का रुख किया। वह कट-ऑफ अंक से 0.25 प्रतिशत से पीछे रह गया।

    याचिकाकर्ता ने सवाल नंबर 8 को चुनौती दी थी, जो नशे की हालत में किसी व्यक्ति द्वारा वसीयत किए जाने से संबंधित था। उसका तर्क था कि यह तय करने के लिए नशे की मात्रा पर विचार करना जरूरी है कि वसीयत करने वाला व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ अवस्था में था या नहीं।

    वहीं, सवाल नंबर 51 में प्रस्ताव, स्वीकृति और उसके बाद प्रस्ताव वापस लिए जाने की स्थिति में अनुबंध बनने के मुद्दे पर सवाल उठाया गया। याचिकाकर्ता का कहना था कि सवाल के विकल्प तैयार करते समय डाक से भेजे गए प्रस्ताव और स्वीकृति से जुड़े नियमों के प्रभाव पर गलत तरीके से विचार किया गया।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि परीक्षा संबंधी मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा सीमित और स्पष्ट रूप से निर्धारित है।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    “गलती इतनी स्पष्ट होनी चाहिए कि उसे सामने लाने के लिए किसी अनुमान या तर्क के सहारे की जरूरत न पड़े।”

    खंडपीठ ने यह भी कहा कि किसी प्रश्न और उसके उत्तर को सही मानने की धारणा होती है। यदि कोई संदेह हो, तो उसका लाभ परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था को दिया जाना चाहिए।

    खंडपीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता की आपत्तियां विश्लेषण और अनुमानों पर आधारित थीं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि वह याचिकाकर्ता द्वारा बताए गए सही विकल्प से सहमत भी हो जाए, तब भी वह सवाल नंबर 8 और 51 पर आपत्तियों की जांच के लिए गठित विशेषज्ञ समिति की राय को अपनी राय से नहीं बदल सकता।

    कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि याचिकाकर्ता ने निर्धारित समयसीमा के भीतर आपत्तियां दर्ज नहीं कराई थीं।

    खंडपीठ ने कहा,

    “ऐसी परीक्षाओं के आयोजन के लिए प्रत्येक चरण में जरूरी तैयारियों को देखते हुए समयसीमा महत्वपूर्ण है।”

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की।

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