छात्र प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई का मामला: हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस से मांगा जवाब, वीडियो और CCTV फुटेज सुरक्षित रखने का आदेश

Amir Ahmad

22 July 2026 5:30 PM IST

  • छात्र प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई का मामला: हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस से मांगा जवाब, वीडियो और CCTV फुटेज सुरक्षित रखने का आदेश

    दिल्ली हाईकोर्ट ने 20 जुलाई को कथित NEET-UG प्रश्नपत्र लीक के विरोध में आयोजित संसद चलो मार्च के दौरान छात्रों पर दिल्ली पुलिस द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों से चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा।

    चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान निर्देश दिया कि घटना से जुड़े सभी प्रासंगिक रिकॉर्ड, जिनमें सीसीटीवी फुटेज और उपलब्ध वीडियो रिकॉर्डिंग शामिल हैं, अगली सुनवाई तक सुरक्षित रखे जाएं।

    याचिकाओं की ओर से सीनियर एडवोकेट एन. हरिहरन, गोपाल शंकरनारायणन और विकास सिंह ने पक्ष रखा, जबकि दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू पेश हुए।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि जंतर-मंतर पर शुरू हुआ प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण था और प्रदर्शनकारी संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत मिले अपने अधिकारों का प्रयोग कर रहे थे। उनका आरोप था कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ जरूरत से ज्यादा और असंगत बल का इस्तेमाल किया।

    सीनियर एडवोकेट एन. हरिहरन ने दावा किया कि वीडियो रिकॉर्डिंग से पता चलता है कि छात्रों पर कीलों लगी लाठियों से हमला किया गया पेलेट और विद्युत डंडों का इस्तेमाल किया गया, जिससे 90 से अधिक प्रदर्शनकारी घायल हुए। उन्होंने यह भी कहा कि प्रदर्शन को अवैध घोषित करने संबंधी कोई सार्वजनिक घोषणा नहीं की गई और न ही बल प्रयोग से पहले प्रदर्शनकारियों को हटने की चेतावनी दी गई।

    याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट से मांग की कि घटना की जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) या किसी स्वतंत्र एजेंसी का गठन किया जाए, क्योंकि दिल्ली पुलिस अपने ही कर्मियों के खिलाफ निष्पक्ष जांच नहीं कर सकती।

    सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि उनकी टीम ने घटना से जुड़े करीब 130 वीडियो का सत्यापन किया। उन्होंने आरोप लगाया कि कई लोग बिना पुलिस वर्दी या पहचान पत्र के प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग करते दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि एक वीडियो में अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त संदीप लांबा एक महिला प्रदर्शनकारी को थप्पड़ मारते हुए दिखाई दे रहे हैं।

    सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने कहा कि संसद मार्च की घोषणा पहले से सार्वजनिक है और प्रशासन को भीड़ जुटने की पूरी जानकारी थी। उन्होंने तर्क दिया कि लगभग 20 दिनों से चल रहा प्रदर्शन शांतिपूर्ण है और इसमें छात्र, डॉक्टर, वकील तथा विभिन्न वर्गों के लोग शामिल हैं। उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई आधार नहीं है, जिससे यह साबित हो कि यह अवैध जमावड़ा है।

    वहीं,एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू ने याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि ये तथ्यों को छिपाकर दायर की गईं और इनका आधार सोशल मीडिया के वीडियो हैं, जिनकी प्रामाणिकता पर तुरंत भरोसा नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि प्रदर्शन हिंसक हो गया, पुलिसकर्मी घायल हुए और सरकारी वाहनों को नुकसान पहुंचाया गया। उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू है।

    इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि मामला किसी एक व्यक्ति के साथ हुई कथित घटना तक सीमित नहीं है।

    खंडपीठ ने मौखिक रूप से कहा,

    "यदि यह अवैध जमावड़ा है, जैसा आप कह रहे हैं तो उससे निपटने के लिए कानून में प्रक्रिया तय है। यदि ऐसे मुद्दे जनहित याचिका में उठाए जाते हैं तो यह कैसे कहा जा सकता है कि हर व्यक्ति अलग-अलग FIR दर्ज कराए?"

    हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह इस स्तर पर आरोपों की सत्यता या वीडियो की प्रामाणिकता पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा है। अदालत ने केवल यह सुनिश्चित करने के लिए सभी संबंधित रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश दिया कि मामले की सुनवाई के दौरान आवश्यक साक्ष्य उपलब्ध रहें।

    मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर को होगी।

    उल्लेखनीय है कि दिल्ली पुलिस के अनुसार "संसद चलो" मार्च के दौरान कथित हिंसा, पथराव और तोड़फोड़ के संबंध में अब तक नौ FIR दर्ज की जा चुकी हैं। इनमें सरकारी कर्मचारियों पर हमला, सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना तथा रैपिड एक्शन फोर्स के एक जवान की हत्या के प्रयास जैसे आरोप शामिल हैं।

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