दिल्ली हाईकोर्ट ने EWS छात्रों के लिए स्कूल यूनिफॉर्म के बदले नकद सहायता का फैसला बरकरार रखा, पुनर्विचार याचिका खारिज की

  • दिल्ली हाईकोर्ट ने EWS छात्रों के लिए स्कूल यूनिफॉर्म के बदले नकद सहायता का फैसला बरकरार रखा, पुनर्विचार याचिका खारिज की

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि दिल्ली सरकार का वह फैसला, जिसमें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और वंचित समूह (DG) के छात्रों को स्कूल यूनिफॉर्म के बदले नकद सहायता देने की बात कही गई है, उसे पूरी तरह से मनमाना, सनकी या बिना किसी आधार वाला नहीं कहा जा सकता।

    जस्टिस सुब्रमणियम प्रसाद और जस्टिस रेनू भटनागर की खंडपीठ ने कहा कि किसी नीतिगत फैसले में अदालत का दखल तभी उचित है, जब वह इतना मनमाना या बिना किसी आधार वाला हो कि उससे अदालत की अंतरात्मा ही झकझोर जाए।

    अदालत ने यह टिप्पणी 'जस्टिस फॉर ऑल' नामक NGO की पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए की। इस NGO ने हाई कोर्ट के 23 जनवरी के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें दिल्ली सरकार की उस नीति को स्वीकार किया गया, जिसके तहत यूनिफॉर्म सीधे देने के बजाय उसके लिए आर्थिक सहायता दी जाती है।

    मूल रिट याचिका 'बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009' को लागू करने की मांग के साथ दायर की गई। इसमें विशेष रूप से उन प्रावधानों को लागू करने की बात कही गई, जो दिल्ली के मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों में EWS और DG श्रेणियों के तहत दाखिला लेने वाले बच्चों को मुफ्त किताबें, यूनिफॉर्म और पढ़ाई की अन्य सामग्री उपलब्ध कराने से जुड़े हैं।

    अदालत ने गौर किया कि दिल्ली सरकार ने 10 जून, 2025 को एक नई नीति बनाई, जिसका कारण यूनिफॉर्म खरीदने और बांटने में आने वाली प्रशासनिक कठिनाइयां बताई गईं।

    अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि सरकार ने बताया कि टेंडर प्रक्रिया में लगभग छह महीने लग सकते हैं। इसके अलावा, अलग-अलग स्कूलों में यूनिफॉर्म के डिजाइन, रंग और स्पेसिफिकेशन अलग-अलग होते हैं, जिससे उन्हें खरीदना और बांटना मुश्किल हो जाता है।

    23 जनवरी के अपने फैसले में एक अन्य खंडपीठ ने नीति स्वीकार की और सरकार को निर्देश दिया कि वह यह सुनिश्चित करे कि नीति के अनुसार छात्रों को यूनिफॉर्म के लिए पर्याप्त राशि दी जाए।

    NGO ने फिर से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि पिछली कार्यवाही में उसे अपना जवाब दाखिल करने का मौका नहीं दिया गया, और 23 जनवरी का फैसला कानूनी प्रावधानों के खिलाफ है।

    इस तर्क को खारिज करते हुए खंडपीठ ने कहा कि NGO को पर्याप्त समय दिया गया। साथ ही NGO के वकील ने अदालत में पेश होकर मामले पर विस्तार से बहस भी की थी। उस समय उन्होंने जवाब दाखिल करने के लिए कोई अतिरिक्त समय नहीं मांगा।

    अदालत ने आगे कहा कि समीक्षा याचिका (रिव्यू पिटिशन) असल में पूरे मामले पर फिर से बहस करने की एक कोशिश थी, जो समीक्षा अधिकार क्षेत्र (रिव्यू ज्यूरिसडिक्शन) के दायरे में नहीं आती है।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि समीक्षा याचिका पर अन्य आधारों के अलावा तब विचार किया जा सकता है, जब पूरी सावधानी बरतने के बावजूद कोई नई और महत्वपूर्ण सामग्री सामने आए, या फिर रिकॉर्ड में कोई ऐसी गलती हो जो साफ तौर पर दिखाई दे रही हो।

    खंडपीठ ने गौर किया कि यह दलील कि नई नीति RTE अधिनियम का उल्लंघन करती है, इस पर पिछली कार्यवाही के दौरान पहले ही विचार किया जा चुका था।

    अदालत ने कहा,

    "इन दलीलों पर विचार किया गया। संबंधित कानून को देखा गया और अदालत की यह राय थी कि नई नीति, अधिनियम की योजना के खिलाफ नहीं है। इस समीक्षा याचिका में फिर से उन्हीं तर्कों को उठाया जा रहा है, जो सुनवाई के समय दिए गए।"

    रिकॉर्ड में कोई स्पष्ट गलती न मिलने और किसी महत्वपूर्ण सामग्री पर विचार करने से न चूकने के कारण अदालत ने पुनर्विचार याचिका खारिज की।

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