आवेदन संख्या और उपस्थिति का उल्लेख अनिवार्य: दिल्ली हाइकोर्ट ने जिला कोर्ट्स को जारी किए दिशा-निर्देश
Amir Ahmad
6 Feb 2026 3:53 PM IST

दिल्ली हाइकोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी की सभी जिला कोर्ट्स को विस्तृत प्रैक्टिस दिशानिर्देश जारी करते हुए कहा कि प्रत्येक न्यायिक आदेश में यह स्पष्ट रूप से दर्ज होना चाहिए कि किन आवेदन पर फैसला किया गया और पक्षकार या उनके वकील पेश हुए थे या नहीं।
कोर्ट ने जिला कोर्ट्स के कई आदेशों में बुनियादी विवरणों की कमी पर गंभीर चिंता जताई।
जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि उनके समक्ष बार-बार ऐसे मामले आ रहे हैं, जिनमें लंबित कार्यवाहियों के दौरान दायर अंतरिम और अन्य आवेदनों पर जिला कोर्ट्स द्वारा पारित आदेशों में आवेदन संख्या का कोई उल्लेख नहीं होता।
खंडपीठ को प्रशासनिक पक्ष से बताया गया कि सभी आवेदन दाखिल होते समय विधिवत क्रमांकित किए जाते हैं। इस पर हाइकोर्ट ने निर्देश दिया कि प्रत्येक आवेदन को दाखिले के समय अनिवार्य रूप से पंजीकृत किया जाए और जब मामला संबंधित अदालत के समक्ष सूचीबद्ध हो तो कारण सूची में भी उस आवेदन की पंजीकरण संख्या दर्शाई जाए।
कोर्ट ने आदेश में कहा,
“आवेदन में की गई दलीलों में संबंधित आवेदन संख्या का उल्लेख किया जाना आवश्यक होगा। इसी प्रकार, उन आवेदनों पर पारित आदेशों में भी यह स्पष्ट रूप से दर्ज होना चाहिए कि आदेश किस आवेदन संख्या में पारित किया गया।”
हाइकोर्ट ने दिल्ली की सभी जिला अदालतों से इन निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने का अनुरोध करते हुए कहा कि इससे अपीलीय या पुनरीक्षण स्तर पर मामलों की सुनवाई के दौरान आवेदनों का संदर्भ लेना आसान होगा।
कोर्ट ने आगे कहा,
“हम जिला कोर्ट्स से यह भी अनुरोध करते हैं कि उनके द्वारा पारित प्रत्येक न्यायिक आदेश में यह स्पष्ट रूप से दर्ज हो कि पक्षकार या उनके वकील उपस्थित थे या नहीं। यदि कोई भी उपस्थित न हो तो उसका उल्लेख भी आदेश में किया जाए।”
खंडपीठ ने निर्देश दिया,
“इस आदेश की एक प्रति प्रधान जिला एवं सत्र जज को भेजी जाए ताकि इसे सभी जिला जजों के बीच प्रसारित किया जा सके। साथ ही इस कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भी इसकी कॉपी भेजी जाए, जिससे अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके।”
यह आदेश हाइकोर्ट ने ट्रेडमार्क और पासिंग ऑफ से जुड़े एक अपील मामले में पारित किया। यह अपील सुरेश शर्मा द्वारा उस आदेश के खिलाफ दाखिल की गई थी जो वाणिज्यिक अदालत (कमर्शियल कोर्ट) ने कृष्ण लाल ठुकराल द्वारा दायर वाद में पारित किया था।
वादी का आरोप था कि सुरेश शर्मा ठुकराल नाम से मिलते-जुलते ट्रेडमार्क का उपयोग कर अपने माल की बिक्री कर रहे हैं। वादी ने माल की जब्ती हर्जाना और लेखा-जोखा प्रस्तुत करने की भी मांग की थी। विवादित आदेश के जरिए वाणिज्यिक अदालत ने वादी के पक्ष में पारित एकतरफा निषेधाज्ञा को जारी रखा था।
अपील स्वीकार करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि वाणिज्यिक अदालत ने निषेधाज्ञा को बरकरार रखते हुए न तो प्रतिष्ठा (गुडविल) के पहलू पर विचार किया और न ही मामले के गुण-दोष पर कोई ठोस निष्कर्ष दर्ज किया।
खंडपीठ ने विवादित आदेश पूरी तरह कारणरहित बताते हुए निर्देश दिया कि वादी के आदेश 39 नियम 1 और 2 के तहत दायर आवेदन तथा अपीलकर्ता के आदेश 39 नियम 4 के तहत दायर आवेदन पर वाणिज्यिक अदालत नए सिरे से विचार करे।
हाइकोर्ट ने वाणिज्यिक अदालत से यह भी अनुरोध किया कि यदि जिला कोर्ट की रजिस्ट्री द्वारा आवेदनों को पंजीकरण संख्या प्रदान की गई तो नए आदेश में उन पंजीकरण संख्याओं का स्पष्ट उल्लेख किया जाए।

