सुनवाई का अवसर दिए बिना किसी कंपनी को निविदाओं से बाहर नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट ने NTPC का आदेश रद्द किया

Amir Ahmad

23 Jun 2026 4:35 PM IST

  • सुनवाई का अवसर दिए बिना किसी कंपनी को निविदाओं से बाहर नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट ने NTPC का आदेश रद्द किया

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कंपनी को भविष्य की निविदाओं में भाग लेने से रोकने वाला आदेश, जो व्यवहारिक रूप से प्रतिबंध या काली सूची में डालने जैसा प्रभाव रखता हो, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना जारी नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस तेजस करिया और जस्टिस मधु जैन की खंडपीठ ने सौर मॉड्यूल निर्माता कंपनी ग्रू एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ NTPC रिन्यूएबल एनर्जी द्वारा जारी निलंबन आदेश रद्द करते हुए यह टिप्पणी की।

    अदालत ने कहा कि कारोबारी गतिविधियों से निलंबन के आदेश के गंभीर नागरिक और व्यावसायिक परिणाम होते हैं। इसलिए ऐसा आदेश पारित करने से पहले कारण बताओ नोटिस देना और संबंधित पक्ष को सुनवाई का अवसर प्रदान करना आवश्यक है।मामला 1000 मेगावाट क्षमता वाले सौर पार्क परियोजना के लिए सौर फोटोवोल्टिक मॉड्यूल की आपूर्ति संबंधी निविदा से जुड़ा है।

    ग्रू एनर्जी को दिसंबर 2025 में छह कार्य आवंटन पत्र जारी किए गए। हालांकि कंपनी निर्धारित समय में औपचारिक अनुबंध पर हस्ताक्षर नहीं कर सकी और अनुबंध निष्पादन गारंटी भी जमा नहीं कर पाई। शुरुआत में

    कंपनी ने अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं की अनुपलब्धता का हवाला दिया, जबकि बाद में पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होने और कच्चे माल की कीमतें बढ़ने को अपरिहार्य परिस्थिति बताया।

    इसके बाद NTPC ने कार्य आवंटन रद्द किए, बोली सुरक्षा राशि जब्त की, नई निविदा जारी की और कंपनी को छह महीने के लिए भविष्य के कारोबारी लेन-देन से निलंबित कर दिया।

    कंपनी का तर्क था कि निविदा की शर्तों के अनुसार अनुबंध निष्पादित न करने और गारंटी जमा न करने की स्थिति में केवल कार्य आवंटन रद्द किया जा सकता था तथा बोली सुरक्षा राशि जब्त की जा सकती थी। इसके अतिरिक्त भविष्य की निविदाओं से बाहर करना नियमों के विपरीत है।

    दूसरी ओर, NTPC ने कहा कि कंपनी ने बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद अपनी संविदात्मक जिम्मेदारियां पूरी नहीं कीं और लागू नीति के तहत ऐसे मामलों में निलंबन की अनुमति है।

    हाईकोर्ट ने माना कि कंपनी अनुबंध पर हस्ताक्षर करने और गारंटी जमा करने में विफल रही, इसलिए उसे चूककर्ता मानने का NTPC का निर्णय सही था। अदालत ने यह भी कहा कि बाद में जारी अपरिहार्य परिस्थिति संबंधी अधिसूचना कंपनी को उसकी पहले से हुई चूक से मुक्त नहीं कर सकती।

    हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब निविदा दस्तावेजों में ऐसी चूक के परिणाम स्पष्ट रूप से निर्धारित थे, तब NTPC सामान्य प्रावधानों का सहारा लेकर अतिरिक्त दंडात्मक कार्रवाई नहीं कर सकता।

    खंडपीठ ने कहा कि जहां किसी विशेष चूक के लिए विशेष प्रावधान मौजूद हो, वहां सामान्य प्रावधानों का उपयोग नहीं किया जा सकता।

    निलंबन आदेश पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि इसके कारण कंपनी भविष्य में NTPC और उसकी सहायक इकाइयों की निविदाओं में भाग लेने से वंचित हो जाती है, लंबित निविदाओं में उसकी बोलियां अस्वीकार की जा सकती हैं और उसे कोई नया कार्य आवंटित नहीं किया जा सकता। इसलिए यह आदेश गंभीर व्यावसायिक प्रभाव डालता है।

    अदालत ने कहा कि केवल कार्रवाई को "निलंबन" नाम दे देने से प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से बचा नहीं जा सकता। किसी भी प्रकार के प्रतिबंध या ब्लैक लिस्ट में डालने जैसी कार्रवाई से पहले संबंधित पक्ष को पर्याप्त अवसर दिया जाना चाहिए और उसके स्पष्टीकरण पर विचार किया जाना चाहिए।

    चूंकि कंपनी को न तो कारण बताओ नोटिस दिया गया और न ही सुनवाई का अवसर प्रदान किया गया, इसलिए हाईकोर्ट ने निलंबन आदेश को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन मानते हुए रद्द कर दिया।

    हालांकि, अदालत ने नई निविदा प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार किया।

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