अदालत में कही गई 'नहीं छोड़ेंगे' जैसी बात आपराधिक धमकी नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
Amir Ahmad
7 May 2026 1:34 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महिला वादकारी को कथित तौर पर दोबारा कोर्ट आई तो नहीं छोड़ा जाएगा, कहने के आरोपी वकील को राहत देते हुए उसके बरी होने का फैसला बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि यह बयान केवल बहस और झड़प के दौरान किया गया सामान्य गुस्से भरा कथन था, जिसे आपराधिक धमकी नहीं माना जा सकता।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 503 और 506 के तहत आपराधिक धमकी साबित करने के लिए स्पष्ट धमकी, नुकसान पहुंचाने की मंशा और पीड़ित में वास्तविक डर पैदा होना जरूरी है। केवल गुस्से में कही गई अस्पष्ट बातों को आपराधिक धमकी नहीं माना जा सकता।
मामला साल 2010 में तीस हजारी कोर्ट परिसर में हुए विवाद से जुड़ा है। शिकायतकर्ता मोनिका अग्रवाल उनके पिता कृष्ण गोयल और भाई चेतन गोयल ने आरोप लगाया कि वैवाहिक विवाद की सुनवाई के बाद उनके साथ मारपीट की गई। शिकायत के अनुसार मोनिका अग्रवाल के पति के मित्र और वकील रोहित नागपाल ने उन्हें धमकी देते हुए कहा कि यदि वह दोबारा अदालत आईं तो उन्हें नहीं छोड़ा जाएगा।
इस मामले में पुलिस ने IPC की धारा 323, 325, 342 और 506 के तहत FIR दर्ज की थी। बाद में ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को धारा 323 और 341 के तहत दोषी ठहराते हुए परिवीक्षा पर रिहा कर दिया, लेकिन धारा 325 और 506 के आरोपों से बरी कर दिया। अपीलीय अदालत ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि वकील की टिप्पणी आपराधिक धमकी के दायरे में आती है और निचली अदालतों ने गलत तरीके से आरोपियों को राहत दी।
हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि कथित बयान में यह स्पष्ट नहीं था कि किस प्रकार की क्षति पहुंचाने की बात कही गई। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि शिकायतकर्ता डर गईं या उन्होंने अपने कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल करना छोड़ दिया।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा,
“यह अधिकतम अदालत परिसर में हुई कहासुनी के दौरान दिया गया एक अस्पष्ट और गुस्से भरा बयान था।”
अदालत ने मधुश्री दत्ता बनाम कर्नाटक राज्य मामला में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि आपराधिक धमकी साबित करने के लिए स्पष्ट धमकी और डर पैदा करने की मंशा दोनों का होना जरूरी है।
इन्हीं आधारों पर दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए आरोपियों को मिली राहत बरकरार रखी।

