30 साल बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने 5,000 रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में पुलिस ASI की सज़ा बरकरार रखी

Amir Ahmad

29 Jan 2026 3:32 PM IST

  • 30 साल बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने 5,000 रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में पुलिस ASI की सज़ा बरकरार रखी

    दिल्ली हाईकोर्ट ने लगभग तीन दशक पुराने भ्रष्टाचार के एक मामले में एक पुलिस असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर (ASI) की सज़ा और दोषसिद्धि बरकरार रखी।

    जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा की बेंच ने कहा कि गवाहों की गवाही में मामूली कमियां अवैध रिश्वत की मांग और उसे स्वीकार करने के स्पष्ट सबूत को छिपा नहीं सकतीं।

    बेंच ने कहा,

    "रिकॉर्ड पर मौजूद पूरे सबूतों को पढ़ने से पता चलता है कि कमियां मामूली हैं और बहुत ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं हैं। उन्होंने अभियोजन पक्ष के मुख्य मामले पर कोई असर नहीं डाला।"

    बेंच ने बलदेव सिंह द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया, जिन्हें अगस्त 2001 में एक स्पेशल जज ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 और 13(1)(d) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 13(2) के तहत अपराधों के लिए दोषी ठहराया और सज़ा सुनाई थी।

    संक्षेप में 1995 में एक शिकायत दर्ज की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ता जब पुलिस पोस्ट शकूर बस्ती में ASI के पद पर तैनात था तो उसने शिकायतकर्ता से उसके भाई द्वारा शुरू की गई शिकायतों को लेकर उसे परेशान करना बंद करने के लिए 10,000 (बाद में घटाकर 5,000) की मांग की।

    शिकायत पर कार्रवाई करते हुए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने एक जाल बिछाया जिसके दौरान आरोपी से रिश्वत के नोट बरामद किए गए। अपीलकर्ता के हाथ और उसकी जैकेट की जेब में फेनोल्फथेलिन टेस्ट का नतीजा पॉजिटिव आया।

    कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं आया कि सबूतों को कैसे, कब और किस तरह से संरक्षित किया गया या प्रयोगशाला पहुंचने तक वे किसकी हिरासत में थे। हालांकि कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने कभी यह मामला नहीं उठाया कि सबूतों के साथ छेड़छाड़ की गई या उन्हें सुरक्षित नहीं रखा गया।

    हाईकोर्ट के सामनेअपीलकर्ता ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही में विरोधाभास, विशेष रूप से आंशिक रूप से विरोधी पंच गवाहों की गवाही और प्रक्रियात्मक खामियां जैसे कि नमूनों को फोरेंसिक प्रयोगशाला में भेजने में बिना किसी कारण के देरी अभियोजन पक्ष के मामले को अविश्वसनीय बनाती हैं।

    हालांकि कोर्ट ने इस सिद्धांत पर भरोसा किया कि विरोधी गवाहों की गवाही उस हद तक इस्तेमाल की जा सकती है, जिस हद तक वह अभियोजन पक्ष का समर्थन करती है।

    प्रोसीजरल गलतियों के बारे में दलीलों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि अपराध के ज़रूरी तत्व रिश्वत की मांग और उसे स्वीकार करना बिना किसी शक के साबित हो गए।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि हालांकि ट्रायल कोर्ट CrPC की धारा 232 के तहत सुनवाई करने में नाकाम रहा लेकिन इससे कार्यवाही खराब नहीं हुई, क्योंकि आरोपी गंभीर और बड़ा नुकसान दिखाने में नाकाम रहा।

    खास बात यह है कि हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के विरोधी गवाहों को संभालने के तरीके की भी आलोचना की।

    जस्टिस सुधा ने साफ किया कि इंडियन एविडेंस एक्ट किसी गवाह को विरोधी घोषित करने का प्रावधान नहीं करता है और न ही यह किसी पार्टी को अपने ही गवाह से क्रॉस-एग्जामिन करने की इजाज़त देता है।

    कोर्ट ने कहा कि एविडेंस एक्ट की धारा 154 के तहत कोई कोर्ट किसी पार्टी को अपने ही गवाह से सिर्फ़ वही सवाल पूछने की इजाज़त दे सकता है, जो विरोधी पार्टी क्रॉस-एग्जामिनेशन में पूछ सकती है।

    कोर्ट ने आगे कहा कि एविडेंस एक्ट की धारा 145 के तहत विरोधाभासों को साबित करने के लिए सख्त प्रक्रिया है, यह देखते हुए कि विरोधाभास तभी साबित होता है, जब गवाह को विसंगति को समझाने का मौका दिया जाता है। बाद में इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर से उसी बारे में सवाल पूछे जाते हैं।

    इसके अलावा, FIR दर्ज होने के बाद लगभग 30 साल की देरी के बारे में तर्क पर हाईकोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ़ देरी पूरे प्रॉसिक्यूशन केस पर अविश्वास करने या उसे खारिज करने का कोई कारण नहीं है।

    इसलिए कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सज़ा और साथ-साथ चलने वाली सज़ाओं को बरकरार रखा, जिसमें अधिकतम ढाई साल की कड़ी कैद भी शामिल है।

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