बिना सुनवाई किसी अधिकारी को दोषी नहीं ठहरा सकते: जंतर-मंतर विवाद में पुलिस अधिकारी को जांच से हटाने से दिल्ली हाईकोर्ट का इनकार

Amir Ahmad

28 July 2026 4:36 PM IST

  • बिना सुनवाई किसी अधिकारी को दोषी नहीं ठहरा सकते: जंतर-मंतर विवाद में पुलिस अधिकारी को जांच से हटाने से दिल्ली हाईकोर्ट का इनकार

    दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को वह याचिका खारिज की, जिसमें जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान महिला को थप्पड़ मारने के आरोपों में विवादों में आए उत्तर-पूर्व जिले के अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त संदीप लांबा की निगरानी से अदालत के निर्देश पर चल रही पुलिस जांच हटाने की मांग की गई।

    जस्टिस गिरीश कठपालिया ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि यदि संबंधित अधिकारी ने कोई गलत काम किया है तो उन्हें कानून के अनुसार उसके परिणाम भुगतने होंगे, लेकिन केवल आरोपों के आधार पर उन्हें दोषी मानते हुए उनके जिम्मे से जांच नहीं हटाई जा सकती।

    अदालत ने मौखिक रूप से कहा,

    "आपको निष्पक्ष रहना होगा। संस्थानों की साख को कमजोर करना बंद कीजिए। यदि उस अधिकारी ने कुछ गलत किया है तो उसे उसके परिणाम भुगतने होंगे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसकी निगरानी से पूरा काम ही वापस ले लिया जाए।"

    याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि महिला को कथित तौर पर थप्पड़ मारने की घटना के बाद याचिकाकर्ता के मन में जांच की निष्पक्षता को लेकर उचित आशंका पैदा हो गई, क्योंकि वह स्वयं भी पुलिस ज्यादती की कथित पीड़िता हैं।

    इस पर अदालत ने टिप्पणी की,

    "क्या आज पूरी दिल्ली पुलिस कटघरे में है? फिर क्या पुलिस FIR दर्ज करना भी बंद कर दे।"

    सुनवाई की शुरुआत में केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि जांच पहले ही पूरी हो चुकी है। याचिकाकर्ता का बयान दर्ज कर लिया गया और अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त ने अपनी जांच रिपोर्ट सक्षम प्राधिकारी को आगे की कार्रवाई के लिए भेज दी।

    इस बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए अदालत ने कहा,

    "एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के बयान को देखते हुए वर्तमान याचिका निष्प्रभावी हो चुकी है। इसे खारिज किया जाता है।"

    आदेश सुनाए जाने के बाद भी याचिकाकर्ता की ओर से आग्रह किया गया कि बाद की घटनाओं के कारण जांच की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न हुआ है, इसलिए याचिका पर विचार किया जाए।

    हालांकि, अदालत ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा,

    "सिर्फ इसलिए कि किसी वीडियो में यह व्यक्ति कथित तौर पर किसी महिला को थप्पड़ मारते हुए दिखाई देता है, हम उसे बदनाम नहीं कर सकते। मान लीजिए कि बाद में वह दोषी भी पाया जाता है, तो क्या यह मान लिया जाए कि वह हर मामले में निष्पक्ष तरीके से काम नहीं करेगा

    जस्टिस कठपालिया ने कहा कि यदि केवल इस आधार पर जांच किसी अन्य अधिकारी को सौंप दी जाए तो यह बिना सुनवाई के संबंधित अधिकारी को दोषी ठहराने जैसा होगा।

    अदालत ने कहा,

    "यदि मैं इस आधार पर जांच स्थानांतरित कर दूं तो क्या मैं उन्हें बिना सुनवाई दोषी नहीं ठहरा रहा? आप यह कहकर उन पर पक्षपात का आरोप लगा रहे हैं। उन्हें भी निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है।"

    याचिका में पुलिस आयुक्त को निर्देश देने की मांग की गई कि जांच को संदीप लांबा के प्रशासनिक नियंत्रण से हटाकर उत्तर-पूर्व जिले के बाहर तैनात किसी पुलिस उपायुक्त की निगरानी में कराया जाए।

    याचिकाकर्ता का कहना था कि जांच लंबित रहने के दौरान जंतर-मंतर प्रदर्शन में महिला को कथित तौर पर थप्पड़ मारने की खबरें सामने आईं और बाद में अधिकारी के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई भी हुई।

    ऐसे में जांच की निष्पक्षता पर उचित संदेह पैदा हो गया। हालांकि याचिकाकर्ता ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इन आरोपों पर फैसला नहीं चाहती बल्कि अदालत के निर्देश पर चल रही जांच में निष्पक्षता का दिखना भी उतना ही जरूरी है।

    यह याचिका उस पहले मामले से जुड़ी है, जिसमें आरोप लगाया गया कि 24-25 मार्च 2025 की दरम्यानी रात याचिकाकर्ता को जाफराबाद थाने में अवैध रूप से हिरासत में रखा गया।

    उस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस जांच के आदेश दिए। बाद में याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उनका बयान दर्ज किए बिना और शिकायत के महत्वपूर्ण पहलुओं की जांच किए बिना रिपोर्ट तैयार कर ली गई। इसके बाद हाईकोर्ट ने उनका बयान दर्ज करने का निर्देश दिया। इसी दौरान जांच की निगरानी बदलने की मांग करते हुए वर्तमान याचिका दायर की गई।

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