सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2023 को चुनौती खारिज, प्रतियोगी परीक्षाओं में न्यायिक समीक्षा बेहद सीमित: दिल्ली हाइकोर्ट
Amir Ahmad
5 Feb 2026 1:31 PM IST

दिल्ली हाइकोर्ट ने सिविल सेवा (प्रारंभिक) परीक्षा 2023, विशेष रूप से पेपर-2 (सीसैट) को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं के मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा अत्यंत सीमित होता है।
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की खंडपीठ ने असफल अभ्यर्थियों द्वारा दायर याचिकाओं के समूह को खारिज किया। इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2023 के सीसैट पेपर में पूछे गए कुछ प्रश्न निर्धारित पाठ्यक्रम से बाहर थे।
हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह विशेषज्ञों की राय पर अपील की तरह विचार नहीं कर सकता और न ही प्रश्नों की पुनः जांच कर अपनी राय विशेषज्ञ संस्थाओं की राय के स्थान पर रख सकता है। अदालत ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों की प्रकृति और स्तर तय करना विषय विशेषज्ञों का कार्यक्षेत्र है। इस मामले में अदालतों के पास ऐसा करने की संस्थागत क्षमता नहीं होती।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सीसैट पेपर-2 में लगभग 11 प्रश्न कक्षा 11 और 12 की एनसीईआरटी पाठ्यक्रम से लिए गए, जबकि परीक्षा नियमों के अनुसार यह पेपर कक्षा 10 स्तर तक सीमित होना चाहिए था। इसी आधार पर उन्होंने संशोधित मेरिट सूची, नई मुख्य परीक्षा आयोजित करने या वैकल्पिक रूप से अतिरिक्त प्रयास और आयु में छूट देने की मांग की थी।
इससे पहले केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने भी इन दलीलों को खारिज कर दिया, जिसके बाद अभ्यर्थियों ने दिल्ली हाइकोर्ट का रुख किया।
हाइकोर्ट ने कहा कि उम्मीदवारों की ओर से विषय विशेषज्ञों के शैक्षणिक आकलन से असहमति मात्र, बिना किसी स्पष्ट त्रुटि या गंभीर अनियमितता को दर्शाए, न्यायिक हस्तक्षेप का आधार नहीं बन सकती। अदालत ने यह भी नोट किया कि अभ्यर्थियों की आपत्तियों के बाद संघ लोक सेवा आयोग ने एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित की थी, जिसने स्पष्ट रूप से निष्कर्ष निकाला कि सभी विवादित प्रश्न निर्धारित पाठ्यक्रम के भीतर ही थे।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि सिविल सेवा परीक्षा 2023 की पूरी चयन प्रक्रिया अब समाप्त हो चुकी है और अदालतें ऐसे मामलों में रिट अधिकार क्षेत्र का उपयोग कर निरर्थक राहत प्रदान नहीं करतीं, विशेषकर जब मामला बड़े स्तर की सार्वजनिक परीक्षा से जुड़ा हो।
अदालत ने अतिरिक्त प्रयास या आयु में छूट देने की मांग को भी कानूनन अस्वीकार्य बताया। हाइकोर्ट ने कहा कि परीक्षा के नियम वैधानिक प्रकृति के होते हैं और ऐसे नीतिगत निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर होते हैं, खासकर तब जब विषय विशेषज्ञ पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हों कि प्रश्न पाठ्यक्रम से बाहर नहीं थे।
इन कारणों से दिल्ली हाइकोर्ट ने सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।

