विभागीय जांच से जानबूझकर दूर रहने वाला कर्मचारी बाद में प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन का दावा नहीं कर सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
Amir Ahmad
20 Jun 2026 3:10 PM IST

विभागीय जांच से जानबूझकर दूर रहने वाला कर्मचारी बाद में प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन का दावा नहीं कर सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) की एक उपनिरीक्षक को सेवा से बर्खास्त किए जाने के आदेश को बरकरार रखते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि जो कर्मचारी विभागीय जांच में जानबूझकर शामिल नहीं होता, वह बाद में एकतरफा कार्रवाई को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताकर चुनौती नहीं दे सकता।
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की खंडपीठ ने अधिकारी की याचिका खारिज करते हुए कहा कि विभागीय जांच में भाग लेने के लिए पर्याप्त अवसर दिए गए लेकिन याचिकाकर्ता स्वयं उपस्थित नहीं हुईं और न ही अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों का खंडन किया।
अदालत ने कहा,
"याचिकाकर्ता ने जानबूझकर जांच कार्यवाही से दूरी बनाए रखी। अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त अवसर मिलने के बावजूद वह जांच में शामिल नहीं हुईं और न ही आरोपों का जवाब दिया। ऐसे में इस चरण पर उठाए गए तर्क उनके मामले को मजबूत नहीं करते।"
मामले में उपनिरीक्षक के खिलाफ तीन आरोप लगाए गए। पहला आरोप था कि उन्होंने ऐसे व्यक्ति से विवाह किया जिसकी पहली पत्नी जीवित है, जो CISF नियमों का उल्लंघन है। दूसरा आरोप ड्यूटी स्थल छोड़ने के बाद बिना अनुमति अनुपस्थित रहने का था। तीसरा आरोप तीन वर्ष के असाधारण अवकाश के लिए आवेदन करने का झूठा दावा करने से संबंधित था।
विभागीय जांच के दौरान अभियोजन पक्ष ने 16 गवाहों के बयान दर्ज कराए और दस्तावेजी साक्ष्य भी प्रस्तुत किए। जांच में आरोप सिद्ध पाए जाने के बाद उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
याचिकाकर्ता ने अदालत से सेवा में बहाली, सेवा की निरंतरता और अन्य लाभ देने की मांग की थी। उनका तर्क था कि जांच एकतरफा ढंग से की गई और जांच अधिकारी उसी CISF इकाई से होने के कारण पक्षपाती है।
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार किया। अदालत ने कहा कि CISF नियम, 2001 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो उसी इकाई के अधिकारी को जांच अधिकारी नियुक्त करने पर रोक लगाता हो।
पीठ ने कहा,
"सिर्फ यह तथ्य कि जांच अधिकारी उसी इकाई से थे, पक्षपात साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। याचिकाकर्ता ने पक्षपात के आरोप को समर्थन देने के लिए कोई अन्य ठोस आधार प्रस्तुत नहीं किया।"
अदालत ने पाया कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी द्वारा पारित बर्खास्तगी का आदेश ठोस तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों पर आधारित था। साथ ही, अपीलीय और पुनरीक्षण प्राधिकारियों ने भी उसी निष्कर्ष की पुष्टि की थी।
निर्णय प्रक्रिया या संबंधित अधिकारियों के निष्कर्षों में कोई कानूनी त्रुटि न पाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की और बर्खास्तगी का आदेश बरकरार रखा।

