POSH हैंडबुक में पीड़िता की पहचान उजागर करने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र को लगाई फटकार
Amir Ahmad
8 Sept 2026 4:08 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों की पहचान गोपनीय रखने के कानूनी दायित्व की अनदेखी पर केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से प्रकाशित कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से बचाव संबंधी पुस्तिका में एक यौन उत्पीड़न पीड़िता की पहचान उजागर किए जाने पर सवाल उठाया।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने केंद्र सरकार के वकील को निर्देश दिया कि वह सरकार से जानकारी लेकर अगली सुनवाई में उन अधिकारियों के नाम बताए, जो पुस्तिका की सामग्री तैयार करने के लिए जिम्मेदार थे।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सवाल उठाया कि पुस्तिका में पीड़िता का नाम कैसे प्रकाशित किया जा सकता है।
जस्टिस शर्मा ने कहा कि यह केंद्र सरकार का आधिकारिक प्रकाशन है। इसे सरकार की वेबसाइट पर प्रकाशित करने के साथ व्यापक रूप से प्रसारित भी किया गया।
मामला कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के आरोपी एक व्यक्ति की याचिका से जुड़ा है। आरोपी ने कोर्ट से पुस्तिका से अपना नाम हटाने की मांग की। उसका कहना है कि संबंधित विवाद दोनों पक्षकारों के बीच समझौते से समाप्त हो चुका है।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने बताया कि एक श्रम न्यायाधिकरण का आदेश संबंधित पुस्तिका में उदाहरण के तौर पर शामिल किया गया। इसमें न केवल आरोपी की पहचान उजागर हुई है, बल्कि महिला पीड़िता का नाम भी सामने आ गया। वकील ने कहा कि यह पुस्तिका इंटरनेट पर विभिन्न जगहों पर उपलब्ध है, जिससे महिला की पहचान सार्वजनिक हो गई।
केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि संबंधित पुस्तिका नवंबर 2015 में केवल शैक्षणिक और जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित की गई थी। सरकार ने यह भी बताया कि संबंधित पक्षों के बीच हाल में समझौता हुआ।
इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शैक्षणिक उद्देश्य के लिए भी पीड़िता का नाम उजागर करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
जस्टिस शर्मा ने कहा कि अदालतों के फैसलों में भी यौन उत्पीड़न या यौन अपराध से जुड़ी पीड़िताओं की पहचान छिपाई जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देश मौजूद हैं और अब पीड़िता की पहचान उजागर करना दंडनीय भी हो सकता है।
कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की पहचान की सुरक्षा को लेकर कई स्थापित फैसले मौजूद हैं। संबंधित पक्ष अगर बाद में अदालत का रुख करते हैं, तब भी इससे अधिकारियों की उस जिम्मेदारी पर कोई असर नहीं पड़ता कि वे कानून का पालन करें।
जस्टिस शर्मा ने कहा कि देर से अदालत आने की स्थिति भी सरकार या किसी अन्य संबंधित व्यक्ति को कानून का पालन करने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करती। यह जिम्मेदारी सभी की है, जिसमें सरकार भी शामिल है।
मामले की अगली सुनवाई कल (बुधवार) होगी।


