CrPC की धारा 469 : सीमा अवधि पुलिस अधिकारी की जानकारी की तिथि से शुरू, FIR की तारीख से नहीं: दिल्ली हाइकोर्ट

Amir Ahmad

27 Feb 2026 1:24 PM IST

  • CrPC की धारा 469 : सीमा अवधि पुलिस अधिकारी की जानकारी की तिथि से शुरू, FIR की तारीख से नहीं: दिल्ली हाइकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 469 के तहत सीमा अवधि उस दिन से प्रारंभ होती है, जब पुलिस अधिकारी को अपराध की जानकारी प्राप्त होती है, न कि उस बाद की तारीख से जब औपचारिक रूप से प्राथमिकी दर्ज की जाती है।

    जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने इसी सिद्धांत को लागू करते हुए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा दायर आरोपपत्र को सीमा अवधि से परे मानते हुए निरस्त किया।

    मामला एक लोकसेवक के विरुद्ध निजी व्यवसाय चलाने के आरोप में CBI द्वारा शुरू किए गए अभियोजन से संबंधित था। कथित कृत्य वर्ष 1995 में तलाशी और जब्ती कार्रवाई के दौरान सामने आए। हालांकि FIR बाद में दर्ज की गई और आरोपपत्र वर्ष 1998 में दाखिल किया गया, जो संबंधित अपराधों के लिए निर्धारित वैधानिक सीमा अवधि से अधिक था।

    अभियोजन ने देरी को उचित ठहराते हुए तर्क दिया कि सीमा अवधि की गणना FIR दर्ज होने की तिथि से की जानी चाहिए। साथ ही विशेषज्ञ और न्यायवैज्ञानिक प्रयोगशाला की रिपोर्ट प्राप्त करने में लगे समय का भी हवाला दिया गया।

    हाइकोर्ट ने CrPC की धारा 468 और 469 का ट्रायल करते हुए कहा कि जहां अपराध के घटित होने की जानकारी तत्काल उपलब्ध नहीं होती, वहां सीमा अवधि उस दिन से शुरू होती है, जब अपराध की जानकारी पुलिस अधिकारी को प्रथम बार प्राप्त होती है।

    अदालत ने कहा कि जब जांच एजेंसी को वर्ष 1995 में ही दस्तावेजों की जब्ती के दौरान कथित अपराध की जानकारी मिल गई थी तो उसी समय से सीमा अवधि प्रारंभ हो गई। बाद में FIR दर्ज करने से सीमा अवधि की गणना को बदला या पुनः प्रारंभ नहीं किया जा सकता।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    “सीमा अवधि पुलिस अधिकारी को अपराध की जानकारी प्राप्त होने की तिथि से प्रारंभ होती है। प्रथम दृष्टया निजी व्यवसाय चलाने का कथित अपराध जब्त दस्तावेजों से ही उजागर हो गया। ऐसे में यह कहना कि न्यायवैज्ञानिक रिपोर्ट प्राप्त करने में समय लगा, स्वीकार्य नहीं है।”

    अदालत ने यह भी कहा कि प्रारंभिक जांच में गवाहों के बयान दर्ज होने या अपराध प्रथम दृष्टया सिद्ध होने का आधार भी सीमा अवधि को आगे बढ़ाने का कारण नहीं बन सकता, क्योंकि संबंधित दस्तावेज वर्ष 1995 से ही उपलब्ध थे।

    निर्णय में स्पष्ट किया गया,

    “सीमा अवधि 24.11.1995 या 01.02.1996 से प्रारंभ मानी जाएगी, न कि 24.11.1997 को FIR दर्ज किए जाने की तिथि से।”

    इन परिस्थितियों में हाइकोर्ट ने CBI की दो वर्ष की देरी को स्वीकार करने से इनकार करते हुए पुनर्विचार याचिका स्वीकार की और आरोपपत्र को निरस्त किया।

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