दिल्ली हाईकोर्ट ने 1995 के CBI रिश्वत जाल मामले में पुलिस सब-इंस्पेक्टर की सजा बरकरार रखी
Amir Ahmad
4 Feb 2026 12:35 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने 1995 के भ्रष्टाचार मामले में दिल्ली पुलिस के सब-इंस्पेक्टर को सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी। यह मामला केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा दर्ज किया गया था।
जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए अपील खारिज कर दी। आरोपी सब-इंस्पेक्टर को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947 की धारा 7 तथा धारा 13(1)(d) सहपठित धारा 13(2) के तहत दोषी ठहराया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
अक्टूबर, 1995 में दर्ज शिकायत के अनुसार, आरोपी सब-इंस्पेक्टर (तत्कालीन तैनाती: जामा मस्जिद थाना) ने शिकायतकर्ता से फर्जी विश्वविद्यालय डिग्री से जुड़े एक आपराधिक मामले में कार्रवाई से बचाने के लिए ₹5,000 की रिश्वत मांगी थी। शिकायत पर कार्रवाई करते हुए CBI ने तिस हजारी अदालत परिसर में ट्रैप लगाया, जिस टैक्समें रिश्वत की राशि आरोपी के निर्देश पर कार्य कर रहे एक हेड कॉन्स्टेबल से बरामद की गई।
दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए आरोपी ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास, कुछ महत्वपूर्ण गवाहों की गैर-परीक्षा टेप-रिकॉर्डेड साक्ष्य के कथित दोषपूर्ण संचालन और CBI मैनुअल के उल्लंघन जैसे आधार उठाए। यह भी तर्क दिया गया कि रिश्वत की मांग (demand) संदेह से परे सिद्ध नहीं हुई, जबकि यह भ्रष्टाचार के अपराधों के लिए अनिवार्य तत्व है।
इन दलीलों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मामूली असंगतियाँ और प्रक्रियात्मक चूक अभियोजन के मूल मामले को कमजोर नहीं करतीं। अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता का बयान विश्वसनीय है और अन्य साक्ष्यों से महत्वपूर्ण बिंदुओं पर पुष्टि होती है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ गवाहों जैसे शिकायतकर्ता के परिजन या अदालत परिसर में मौजूद सार्वजनिक व्यक्तियों—की गैर-परीक्षा अभियोजन के लिए घातक नहीं है।
CBI मैनुअल के कथित उल्लंघन के मुद्दे पर कोर्ट ने दोहराया कि मैनुअल एक प्रशासनिक निर्देश है और उसे वैधानिक बल प्राप्त नहीं है।
न हक न
ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई खामी न पाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और आरोपी सब-इंस्पेक्टर की दोषसिद्धि व सजा को बरकरार रखा।

