देश को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बदनाम नहीं होने दे सकते: अमृत विल्सन की OCI रद्दीकरण याचिका पर दिल्ली हाइकोर्ट की टिप्पणी
Amir Ahmad
16 Feb 2026 4:42 PM IST

दिल्ली हइकोर्ट ने यूनाइटेड किंगडम स्थित लेखिका और पत्रकार अमृत विल्सन की OCI कार्ड रद्द किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से अपना जवाब दाखिल करने को कहा है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा,
“हम इतने सहिष्णु राज्य नहीं हो सकते कि अपने ही देश को अंतरराष्ट्रीय मंच पर आलोचना या बदनाम होने की अनुमति दे दें।”
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि अमृत विल्सन के संबंध में इंटेलिजेंस ब्यूरो की रिपोर्ट्स मौजूद हैं, जिनमें उनके कथित भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगाए गए हैं।
विल्सन की ओर से सीनियर एडवोकेट त्रिदीप पेस ने दलील दी कि OCI कार्ड रद्द करने के लिए जारी कारण बताओ नोटिस पूरी तरह विवरणों से रहित है। उन्होंने आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि नोटिस में किसी ठोस सामग्री या विशिष्ट कारणों का उल्लेख नहीं है।
केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने अदालत को एक सीलबंद लिफाफा सौंपा जिसमें OCI रद्द करने के कारण बताए गए।
अदालत ने मामले को अगस्त में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करते हुए केंद्र सरकार को विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
याचिका में क्या कहा गया,
अमृत विल्सन ने 17 मार्च, 2023 को लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग द्वारा पारित आदेश रद्द करने की मांग की। उनका कहना है कि OCI कार्ड रद्द करने का आदेश प्रथम दृष्टया अवैध और मनमाना है।
भारतीय उच्चायोग ने नवंबर, 2022 में उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया, जिसमें आरोप लगाया गया कि वे भारतीय सरकार के खिलाफ हानिकारक प्रचार में संलग्न हैं। कई भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल रही हैं, जो भारत की संप्रभुता और अखंडता तथा आम जनहित के लिए खतरा हैं।
याचिका में कहा गया कि नोटिस मनमाना है, क्योंकि इसमें आरोपों को सिद्ध करने के लिए कोई ठोस विवरण या सामग्री नहीं दी गई।
विल्सन ने यह भी कहा कि 17 अप्रैल, 2023 को उन्होंने गृह मंत्रालय के समक्ष पुनर्विचार आवेदन दायर किया, जिस पर अब तक निर्णय नहीं हुआ है जबकि उन्होंने कई बार अनुरोध किया।
याचिका में कहा गया,
“इस कारण वह आरोपों के विरुद्ध अपना बचाव तैयार नहीं कर सकीं और विशिष्ट आरोपों पर अपना पक्ष प्रभावी रूप से प्रस्तुत नहीं कर पाईं, जिसके परिणामस्वरूप उनका OCI कार्ड मनमाने ढंग से रद्द कर दिया गया।”
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि एक लेखिका और पत्रकार के रूप में विभिन्न सरकारों, जिनमें भारतीय सरकार भी शामिल है, की नीतियों और मानवाधिकार संबंधी मुद्दों पर टिप्पणी करना उनका कर्तव्य है। ऐसी आलोचना उनके मौलिक अधिकारों के दायरे में आती है और जनता के सूचना प्राप्त करने के अधिकार से भी जुड़ी है।
याचिका में यह भी कहा गया कि OCI रद्द होने के कारण उन्हें गंभीर कठिनाइयों और मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ रहा है। इससे वे अपने मूल देश से स्थायी रूप से संबंध तोड़ने को विवश हो गईं। साथ ही वे भारत नहीं आ पा रहीं, जहां उन्हें अपनी मां के लेखन पर आधारित शोध परियोजना पूरी करनी थी। इस संबंध में प्रकाशकों से बातचीत भी चल रही थी।
मामले की अगली सुनवाई अगस्त में होगी।

