13 साल से कम उम्र के बच्चों की सोशल मीडिया पहुंच पर रोक की मांग, दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र से विचार करने को कहा
Amir Ahmad
1 Sept 2026 3:06 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने 13 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने और 13 से 16 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया सामग्री को नियंत्रित करने संबंधी दिशा-निर्देशों की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार को विचार करने का निर्देश दिया।
जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ के समक्ष केंद्र सरकार ने कहा कि याचिका में मांगी गई राहत नीतिगत विषय से जुड़ी है। सरकार ने कहा कि यदि इस संबंध में अभ्यावेदन दिया जाता है तो उस पर कानून के अनुसार विचार कर फैसला किया जाएगा।
सोशल मीडिया मंचों में से एक मेटा की ओर से सीनियर एडवोकेट अरविंद दातार ने कहा कि जब केंद्र सरकार ऐसे अभ्यावेदन पर विचार करती है तो आम तौर पर संबंधित सभी पक्षों, जिसमें सोशल मीडिया मंच भी शामिल हैं, का पक्ष देखा जाता है।
इसके बाद हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं के अभ्यावेदन के साथ 20 अगस्त 2026 को दाखिल सुझावों पर भी विचार करे और कारणयुक्त आदेश पारित करे। कोर्ट ने केंद्र को यह स्वतंत्रता भी दी कि वह उचित समझे तो अभ्यावेदन पर विचार करते समय याचिकाकर्ताओं के प्रतिनिधियों को सुनवाई का अवसर दे सकता है।
याचिका में 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया मंचों तक पहुंच पर रोक लगाने की मांग की गई। इसके अलावा 13 से 16 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रात के समय रोक लगाने संबंधी दिशा-निर्देश बनाने की मांग भी की गई।
याचिकाकर्ताओं ने बच्चों के मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली अनुचित और शोषणकारी सामग्री के प्रसार पर रोक लगाने के लिए भी दिशा-निर्देश बनाने की मांग की थी।
याचिका में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000, डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 और लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 के मौजूदा प्रावधानों को अधिक सख्ती से लागू करने की मांग की गई।
इसके अलावा सोशल मीडिया मंचों के कामकाज की निगरानी के लिए भी उचित व्यवस्था बनाने की मांग की गई, ताकि बच्चों की निजता को लेकर बनाए गए नियमों और नीतियों का प्रभावी ढंग से पालन सुनिश्चित किया जा सके।
हाईकोर्ट ने नीतिगत विषय होने के कारण सीधे दिशा-निर्देश जारी करने के बजाय केंद्र सरकार को याचिका और सुझावों पर विचार कर कानून के अनुसार उचित निर्णय लेने को कहा।


