दुर्भाग्यपूर्ण: दिल्ली हाईकोर्ट ने अदालतों में अंधाधुंध स्थगन की संस्कृति पर जताई चिंता, भविष्य में बदलाव की जताई उम्मीद

Amir Ahmad

3 Jan 2026 5:25 PM IST

  • दुर्भाग्यपूर्ण: दिल्ली हाईकोर्ट ने अदालतों में अंधाधुंध स्थगन की संस्कृति पर जताई चिंता, भविष्य में बदलाव की जताई उम्मीद

    दिल्ली हाईकोर्ट ने अदालतों में बार-बार और बिना ठोस कारण के स्थगन मांगे जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया।

    न्यायालय ने कहा कि समय के साथ एक ऐसी संस्कृति विकसित हो गई है, जिसमें यह गलत अपेक्षा बन गई कि किसी भी मामले में केवल मांग करने पर ही स्थगन मिल जाएगा।

    जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्हें आशा है कि भविष्य में अदालतों में स्थगन मांगने की यह प्रवृत्ति बदलेगी।

    उन्होंने कहा कि स्थगन इस तरह मांगे जा रहे हैं, जैसे यह एक स्वाभाविक अधिकार हो, जबकि इसका अन्य वकीलों और न्यायालय के समय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

    न्यायालय ने यह टिप्पणी धीरज अरोड़ा द्वारा दायर उस आवेदन पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें उन्होंने समन्वय पीठ (को-ऑर्डिनेट बेंच) द्वारा लगाए गए 20,000 के खर्च को माफ करने की मांग की थी।

    याचिकाकर्ता का कहना था कि उनके वकील तिस हजारी अदालत में समयबद्ध मामले में व्यस्त थीं, जिसके कारण वह दिल्ली हाईकोर्ट में उपस्थित नहीं हो सकीं।

    याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि अधिवक्ता एक अकेली महिला हैं, जिनके दो बच्चे हैं और उनके जीवन में कई व्यक्तिगत कठिनाइयाँ हैं, इसलिए लगाए गए खर्च को माफ किया जाना चाहिए।

    हालांकि जस्टिस कृष्णा ने इस दलील से सहमति नहीं जताई और कहा कि वकील की अनुपस्थिति को व्यक्तिगत कठिनाई बताना उचित नहीं है, क्योंकि वास्तव में यह एक पेशेवर व्यस्तता थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार का आचरण सराहनीय नहीं है।

    इसके बावजूद न्यायालय ने यह कहते हुए कि भविष्य में इस तरह की स्थगन संस्कृति में बदलाव की उम्मीद की जाती है, 20,000 की लागत को माफ कर दिया।

    इस फैसले के माध्यम से दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया में अनुशासन समय के सम्मान और जिम्मेदार पेशेवर आचरण की आवश्यकता को रेखांकित किया है।

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