दिल्ली दंगों के मामले में पुलिस जांच पर कड़ी टिप्पणी, कोर्ट ने कहा- आरोपियों के अधिकार रौंद दिए गए

Amir Ahmad

3 Feb 2026 1:25 PM IST

  • दिल्ली दंगों के मामले में पुलिस जांच पर कड़ी टिप्पणी, कोर्ट ने कहा- आरोपियों के अधिकार रौंद दिए गए

    दिल्ली कोर्ट ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में दिल्ली पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठाते हुए पुलिस आयुक्त को कार्रवाई के निर्देश दिए।

    अदालत ने सबूत जुटाने और उन्हें साबित करने में गंभीर चूक पाते हुए कहा कि जिस तरीके से मामले के रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की गई, वह निगरानी तंत्र के पूरी तरह विफल होने को दर्शाता है।

    कड़कड़डूमा कोर्ट के अपर सेशन जज प्रवीण सिंह ने कहा कि जिस ढिठाई और दंडमुक्ति के साथ केस रिकॉर्ड में हेरफेर किया गया उससे यह साफ कि सीनियर लेवल पर निगरानी व्यवस्था ने काम ही नहीं किया।

    अदालत ने टिप्पणी की कि संबंधित थाना प्रभारी और एसीपी जैसे पर्यवेक्षण अधिकारियों द्वारा गढ़ी हुई चार्जशीट आगे बढ़ाई गई।

    कोर्ट ने कहा,

    “यदि निगरानी तंत्र अपेक्षित रूप से काम करता तो न तो आरोपियों के अधिकार रौंदे जाते और न ही समाज की यह अपेक्षा कुचली जाती कि आपराधिक मामलों की निष्पक्ष जांच होगी।”

    इसी आधार पर कोर्ट ने आदेश दिया कि इस फैसले की प्रति दिल्ली पुलिस आयुक्त के समक्ष रखी जाए ताकि जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई की जा सके और भविष्य में ऐसी शर्मनाक स्थिति की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

    यह आदेश अदालत ने प्रेम प्रकाश, ईशु गुप्ता, राजकुमार, अमित, राहुल और हरिओम शर्मा को बरी करते हुए पारित किया। यह मामला दंगों के दौरान अजीजिया मस्जिद के पास आगजनी, तोड़फोड़ और हिंसा की घटनाओं से जुड़ा था।

    केस डायरी का अवलोकन करते हुए अदालत ने पाया कि आरोपियों को फंसाने के लिए गवाहों के बयान बाद में दर्ज किए गए। इतना ही नहीं अदालत के समक्ष गढ़े हुए बयान पेश किए गए मूल बयान छिपाए गए और गवाहों को प्रभावित किया गया।

    जज ने कहा कि 7 मार्च, 2020 को पहली गिरफ्तारी होने तक जांच अधिकारी के पास कम से कम दो गवाहों के आधार पर किसी भी आरोपी के खिलाफ कोई ठोस सुराग नहीं था।

    अदालत ने यह भी पाया कि अभियोजन का पूरा मामला ऐसे गवाहों पर आधारित था, जिन्होंने अपने शुरुआती बयानों में दंगाइयों को न देखने की बात कही थी लेकिन बाद में

    छेड़छाड़ किए गए मनगढ़ंत और झूठे बयानों में चार लोगों को नाम सहित पहचानने का दावा किया।

    एक और चौंकाने वाली बात पर अदालत ने ध्यान दिलाया कि जिन कथित गढ़े हुए शुरुआती बयानों को पेश किया गया, उनमें भी इलाके के उस कुख्यात व्यक्ति का नाम नहीं था जो कथित तौर पर भीड़ का नेतृत्व कर रहा था।

    इन सभी तथ्यों के आधार पर अदालत ने न सिर्फ आरोपियों को बरी किया बल्कि दिल्ली पुलिस की जांच प्रक्रिया पर तीखी फटकार भी लगाई।

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