विदेशी अदालत के आदेश की अवहेलना कर बच्चे को अपने पास रखकर कानूनी लाभ नहीं लिया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
Amir Ahmad
3 July 2026 1:50 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय अभिरक्षा विवाद में नाबालिग बच्चे को कनाडा में रह रहे उसके पिता के पास भेजने का निर्देश देते हुए कहा कि किसी विदेशी अदालत के आदेश की अवहेलना कर बच्चे को अपने पास रखने वाला अभिभावक बाद में यह कहकर कानूनी लाभ नहीं ले सकता कि समय बीतने के कारण बच्चा अब नए माहौल में पूरी तरह रच-बस गया है।
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद और जस्टिस हरिश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने कहा कि यदि किसी पक्ष को पहले विदेशी अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करने, वहां मुकदमा लड़ने और प्रतिकूल फैसला आने के बाद उस आदेश की अनदेखी कर दूसरे देश में शरण लेने की अनुमति दी जाए, तो इससे न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता और अनुशासन पर गंभीर असर पड़ेगा।
अदालत ने कहा,
"यदि पक्षकार पहले विदेशी अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करें, वहां मुकदमा लड़ें और प्रतिकूल आदेश आने के बाद उसकी अनदेखी कर दूसरे देश में चले जाएं तो इससे विभिन्न देशों की न्यायिक संस्थाओं की प्रभावशीलता और अधिकार गंभीर रूप से प्रभावित होंगे। ऐसा आचरण अंतरराष्ट्रीय अभिरक्षा विवादों में न्यायिक आदेशों से बचने को बढ़ावा देगा।"
मामला पिता द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा था। पिता ने मार्च 2020 में कनाडा के ओंटारियो स्थित न्यायालय द्वारा पारित आदेश के अनुसार अपने नाबालिग बेटे को कनाडा वापस भेजने और उसकी अभिरक्षा सौंपने की मांग की थी।
पिता का कहना था कि अक्टूबर 2019 में मां उसकी सहमति के बिना बच्चे को भारत ले आई थी। बाद में कनाडा की अदालत ने बच्चे को वापस भेजने का आदेश देते हुए अस्थायी एकल अभिरक्षा पिता को सौंप दी थी।
मां ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि बच्चा पिछले लगभग छह वर्षों से भारत में रह रहा है और यहां के सामाजिक एवं भावनात्मक माहौल में पूरी तरह घुल-मिल चुका है। ऐसे में उसे कनाडा भेजना उसके लिए नुकसानदेह होगा।
हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि बच्चे के नए स्थान पर पूरी तरह बस जाने के सिद्धांत का उपयोग इस तरह नहीं किया जा सकता कि उससे किसी पक्ष को न्यायिक आदेश की जानबूझकर अवहेलना का लाभ मिल जाए।
अदालत ने कहा कि मां ने स्वयं कनाडा की अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार किया और वहां कार्यवाही में हिस्सा लिया था। इसलिए केवल फैसला अपने विरुद्ध आने के कारण अब वह उस अदालत के आदेश को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
खंडपीठ ने कहा,
"भारत में बच्चे का लगातार रहना किसी वैध न्यायिक निर्णय या भारत की किसी सक्षम अदालत द्वारा मान्य अभिरक्षा का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उस न्यायिक आदेश के बावजूद बनी हुई स्थिति है, जिसमें इसके विपरीत निर्देश दिए गए।"
अदालत ने यह भी कहा कि यदि ऐसी स्थिति को स्वीकार किया जाए तो इससे न्यायिक अनुशासन कमजोर होगा, पक्षकार अपनी सुविधा के अनुसार अदालत चुनने लगेंगे और प्रतिकूल आदेशों से बचने के लिए सीमापार कृत्रिम परिस्थितियां पैदा करने को प्रोत्साहन मिलेगा।
हाईकोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि बच्चे को कनाडा भेजने से उसके शारीरिक, मानसिक, शैक्षणिक या मनोवैज्ञानिक हितों को नुकसान पहुंचेगा।
अदालत ने यह भी दर्ज किया कि पिता आर्थिक रूप से सक्षम है और उसने मां तथा बच्चे दोनों के रहने की उचित व्यवस्था करने का आश्वासन दिया।
इन परिस्थितियों में हाइकोर्ट ने मां को छह सप्ताह के भीतर बच्चे को कनाडा की अदालत के अधिकार क्षेत्र में वापस ले जाने और अस्थायी अभिरक्षा पिता को सौंपने का निर्देश दिया।
अदालत ने मां को भी बच्चे के साथ कनाडा जाने की अनुमति देते हुए वहां उसके रहने की उपयुक्त व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।


