अगर समझौते के कारण एफआईआर रद्द हुई तो एससी/एसटी नियमों के तहत प्राप्त मुआवजा वापस किया जाना चाहिए: दिल्ली हाईकोर्ट

  • अगर समझौते के कारण एफआईआर रद्द हुई तो एससी/एसटी नियमों के तहत प्राप्त मुआवजा वापस किया जाना चाहिए: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में एक फैसला में कहा कि एससी/एसटी नियमों के तहत प्राप्त कोई भी मुआवज़ा तब वापस किया जाना चाहिए जब किसी समझौते के कारण कानूनी कार्यवाही बंद हो जाती है। जस्टिस संजीव नरूला ने कहा कि एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मुआवज़ा तंत्र नियमों के साथ पढ़ा जाए तो यह कानूनी कार्यवाही की निरंतरता से आंतरिक रूप से जुड़ा हुआ है।

    कोर्ट ने कहा, "अधिनियम और साथ के नियमों का उद्देश्य अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के खिलाफ अत्याचारों को रोकना है, यह सुनिश्चित करके कि अपराधियों पर मुकदमा चलाया जाए और पीड़ितों को कानूनी प्रक्रिया के दौरान सहायता प्रदान की जाए। मुआवज़ा न्याय को सुगम बनाने के साधन के रूप में कार्य करता है, न कि अपने आप में एक लक्ष्य के रूप में।"

    निर्णय में कहा गया है कि जहां पीड़ित और आरोपी सौहार्दपूर्ण तरीके से मामले को सुलझा लेते हैं, वहां अधिनियम के तहत पीड़ित होने का मूल आधार प्रभावी रूप से नकारा जाता है। इसलिए, ऐसे परिदृश्यों में पूर्ण मुआवज़ा देना कानून की भावना के विपरीत होगा। प्रतिपूर्ति का सिद्धांत यह तय करता है कि किसी को दूसरे की कीमत पर अन्यायपूर्ण तरीके से समृद्ध नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि इस संदर्भ में, राज्य को धन वितरित करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए जब अभियोजन के माध्यम से पीड़ित का समर्थन करने का इच्छित उद्देश्य अब लागू नहीं होता है।

    निर्णय में कहा गया, "आदर्श रूप से, एससी/एसटी नियमों के तहत प्राप्त कोई भी मुआवजा तब वापस किया जाना चाहिए जब किसी समझौते के कारण कानूनी कार्यवाही बंद हो जाती है।"

    न्यायालय ने यह टिप्पणियां एक व्यक्ति (पीड़ित) द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए कीं, जिसमें 2019 में दर्ज एक प्राथमिकी में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) नियमों के अनुसार मुआवजे के रूप में एक लाख रुपये में से 10,000 रुपये की राशि मंजूर करने वाले सब डिविजनल मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी गई थी।

    जस्टिस नरूला ने कहा कि जिस एफआईआर के आधार पर मामले में पूरा दावा किया गया था, उसे पक्षों के बीच समझौते के परिणामस्वरूप रद्द कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा, "यह एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है, जो कोर्ट की राय में याचिकाकर्ता के आगे मुआवजे की मांग करने के अधिकार को काफी हद तक कमजोर करता है।"

    निर्णय में कहा गया है कि अधिनियम के तहत मुआवजा अपराधों के अभियोजन और अपराधियों को न्याय दिलाने के लिए कानूनी प्रक्रिया में पीड़ित की सक्रिय भागीदारी पर निर्भर करता है।

    कोर्ट ने कहा, “इन परिस्थितियों में, कोर्ट याचिकाकर्ता को दिए जाने वाले मुआवजे को बढ़ाने का निर्देश नहीं दे सकता। परिणामस्वरूप, न्यायालय को प्रतिवादियों को याचिकाकर्ता को कोई अतिरिक्त मुआवजा देने का निर्देश देने का कोई कारण नहीं मिला।"

    केस टाइटलः बलबीर मीना बनाम राज्य (दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) और अन्य

    आदेश पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

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