BCI के अनुशासनात्मक आदेश को आपराधिक कार्यवाही में चुनौती नहीं दे सकते वकील: दिल्ली हाईकोर्ट

  • BCI के अनुशासनात्मक आदेश को आपराधिक कार्यवाही में चुनौती नहीं दे सकते वकील: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अनुशासनात्मक आदेश को केवल एडवोकेट्स एक्ट (Advocate Act) की धारा 38 के तहत सुप्रीम कोर्ट में अपील के जरिए चुनौती दी जा सकती है। वकील आपराधिक कार्यवाही शुरू कराकर या हाईकोर्ट के पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र का सहारा लेकर BCI के अनुशासनात्मक आदेश को अप्रत्यक्ष रूप से चुनौती नहीं दे सकता।

    जस्टिस पुरुषैंद्र कुमार कौरव ने यह टिप्पणी वकील पी. बालासुब्रमणियन की याचिका खारिज करते हुए की। याचिका में प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज-सह-स्पेशल जज (PC Act) के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें कुछ व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग वाली उनकी शिकायत खारिज कर दी गई।

    बालासुब्रमणियन ने आरोप लगाया कि उनके खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई उनके अनुसूचित जाति से संबंधित होने के कारण की गई। उन्होंने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) और IPC की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई की मांग कीं।

    मामले की पृष्ठभूमि में मद्रास हाईकोर्ट का वर्ष 2018 का आदेश था, जिसमें उसके रजिस्ट्रार जनरल को बालासुब्रमणियन के खिलाफ बार काउंसिल ऑफ तमिलनाडु एवं पुडुचेरी में शिकायत दर्ज कराने का निर्देश दिया गया। इसके बाद राज्य बार काउंसिल की अनुशासन समिति ने उन्हें पेशेवर कदाचार का दोषी पाया और तीन वर्ष तक वकालत करने से निलंबित किया।

    एक अन्य अनुशासनात्मक मामले में उन्हें शुरुआत में राज्य बार काउंसिल के रोल से हटा दिया गया। इसके खिलाफ एडवोकेट्स एक्ट की धारा 37 के तहत BCI में अपील की गई। BCI ने अनुशासनात्मक आदेश बरकरार रखते हुए दूसरे मामले में सजा को संशोधित कर पांच वर्ष के लिए वकालत से निलंबन किया।

    इसके बाद बालासुब्रमणियन ने एडवोकेट्स एक्ट की धारा 38 के तहत सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के बजाय राउज एवेन्यू डिस्ट्रिक्ट कोर्ट का रुख किया। उन्होंने आपराधिक कार्रवाई के जरिए अपने खिलाफ पारित अनुशासनात्मक आदेशों को चुनौती देने का प्रयास किया।

    हाईकोर्ट ने निचली अदालत का आदेश बरकरार रखते हुए कहा कि BCI की अनुशासन समिति द्वारा धारा 37 के तहत अपील में पारित आदेश को एडवोकेट्स एक्ट की धारा 38 के तहत सुप्रीम कोर्ट में अपील के जरिए ही चुनौती दी जा सकती है।

    कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने BCI के अनुशासनात्मक आदेशों को आपराधिक कार्रवाई की मांग वाली याचिका के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से चुनौती देने का प्रयास किया। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि CrPC की धाराओं 397 और 401 के तहत उसका पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र निगरानी प्रकृति का है। इसका इस्तेमाल केवल स्पष्ट अधिकार क्षेत्र संबंधी त्रुटि, अवैधता या विकृति को सुधारने के लिए किया जा सकता है।

    कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। BCI के आदेश को समाप्त करने या प्रस्तावित आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के निर्देश देने की मांग भी स्वीकार नहीं की जा सकती।

    इसी के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की।

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