बार एसोसिएशन 'राज्य' की श्रेणी में नहीं आते, ये सार्वजनिक कार्य नहीं करते: दिल्ली हाइकोर्ट
Amir Ahmad
19 Jan 2026 12:24 PM IST

दिल्ली हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया कि बार एसोसिएशन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' या उसकी संस्था की श्रेणी में नहीं आते हैं।
चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने कहा कि बार एसोसिएशनों द्वारा किए जाने वाले कार्य मुख्य रूप से व्यक्तिगत वकीलों के हितों की रक्षा के लिए होते हैं, जिन्हें 'सार्वजनिक कार्य' नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह निर्णय एक महिला वकील की अपील खारिज करते हुए सुनाया, जिसमें उन्होंने अपने चैंबर में वकीलों द्वारा किए गए कथित अनाधिकार प्रवेश के खिलाफ दिल्ली बार काउंसिल को कार्रवाई करने का निर्देश देने की मांग की थी।
हाइकोर्ट ने एकल पीठ के उस पुराने आदेश बरकरार रखा, जिसमें याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि बार एसोसिएशन के विरुद्ध रिट याचिका जारी नहीं की जा सकती। खंडपीठ ने विस्तार से बताया कि चूंकि ये संस्थाएं सार्वजनिक कार्यों का निष्पादन नहीं करती हैं, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दी गई शक्तियों का उपयोग कर उनके खिलाफ कोई आदेश नहीं दिया जा सकता।
अदालत ने माना कि वकीलों के जिस व्यवहार की शिकायत की गई, वह आपराधिक श्रेणी में आ सकता है, लेकिन इसके लिए उच्चतर अदालतों की रिट अधिकारिता का उपयोग करना उचित नहीं है।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि वकीलों के कदाचार की स्थिति में अनुशासनात्मक कार्रवाई करना बार काउंसिल का वैधानिक कर्तव्य है। यदि किसी वकील को दूसरे वकीलों के आचरण से परेशानी है तो उसे सीधे बार काउंसिल के पास शिकायत दर्ज करानी चाहिए या संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत आपराधिक प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए। हाइकोर्ट से सीधे हस्तक्षेप की मांग करना कानूनी प्रक्रिया के अनुकूल नहीं है, क्योंकि बार एसोसिएशन सरकारी तंत्र का हिस्सा नहीं हैं और वे स्वायत्त संस्थाओं के रूप में कार्य करती हैं।
अपील खारिज करते हुए हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिला वकील के पास अभी भी अन्य कानूनी रास्ते खुले हैं। वह सक्षम क्षेत्राधिकार वाली अदालत में सिविल या आपराधिक मामला दर्ज कर सकती हैं या दिल्ली बार काउंसिल के समक्ष अपनी शिकायत ले जा सकती हैं। इस फैसले ने एक बार फिर बार एसोसिएशनों की कानूनी स्थिति को स्पष्ट कर दिया और यह तय किया कि इनके आंतरिक विवादों या निजी कार्यों के लिए सीधे हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाना संवैधानिक रूप से मान्य नहीं होगा।

