अप्रमाणित व्यभिचार के आरोपों के आधार पर अंतरिम भरण-पोषण से इनकार नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाइकोर्ट

Amir Ahmad

5 Feb 2026 12:38 PM IST

  • अप्रमाणित व्यभिचार के आरोपों के आधार पर अंतरिम भरण-पोषण से इनकार नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाइकोर्ट

    दिल्ली हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल व्यभिचार के आरोप, यदि वे प्रमाणित न हों तो घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के तहत पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार करने का आधार नहीं बन सकते।

    हाइकोर्ट ने कहा कि बिना ठोस सबूत लगाए गए ऐसे आरोप अंतरिम चरण में स्वीकार्य नहीं हैं।

    जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125(4) के विपरीत घरेलू हिंसा अधिनियम में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जो केवल इस आधार पर महिला को राहत से वंचित कर दे कि वह कथित रूप से व्यभिचार में रह रही है।

    उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 3 की व्याख्या–2 के अनुसार यह तय करने के लिए कि कोई कृत्य घरेलू हिंसा की श्रेणी में आता है या नहीं, मामले के समस्त तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार किया जाना आवश्यक है।

    हाइकोर्ट ने कहा कि पत्नी के आचरण से जुड़ा कोई भी साक्ष्य जिसमें व्यभिचार के आरोप भी शामिल हैं, प्रासंगिक हो सकता है लेकिन ऐसे आरोपों का निपटारा केवल साक्ष्य के आधार पर सुनवाई के बाद ही किया जा सकता है। केवल आरोपों के आधार पर अंतरिम भरण-पोषण रोका नहीं जा सकता।

    यह मामला उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें पति ने मजिस्ट्रेट अदालत और सत्र अदालत के उस आदेश को चुनौती दी, जिसके तहत उसे पत्नी को 26,000 रुपये प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया।

    पति का कहना था कि पत्नी व्यभिचार में रह रही है, इसलिए वह घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत 'पीड़ित व्यक्ति' नहीं मानी जा सकती।

    पति ने कुछ तस्वीरों के आधार पर आरोप लगाया कि विवाह के रहते हुए पत्नी किसी अन्य व्यक्ति के साथ लिव-इन संबंध में है। वहीं पत्नी ने इन तस्वीरों की प्रामाणिकता से इनकार करते हुए कहा कि वे छेड़छाड़ की हुई और मनगढ़ंत हैं।

    हाइकोर्ट ने पति की दलीलों को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि अंतरिम स्तर पर केवल ऐसे आरोपों के आधार पर भरण-पोषण के आदेश में हस्तक्षेप करना उचित नहीं है। हालांकि दोनों पक्षों द्वारा गंभीर आरोप लगाए जाने को देखते हुए हाइकोर्ट ने मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत दायर याचिका का निपटारा यथाशीघ्र किया जाए और संभव हो तो एक वर्ष के भीतर फैसला सुनाया जाए।

    साथ ही, हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि पत्नी व्यभिचार में रह रही थी और भरण-पोषण की हकदार नहीं है, तो उसे अब तक प्राप्त पूरी अंतरिम राशि पति को 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटानी होगी।

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