अनुसूचित जनजाति का व्यक्ति चाहे तो हिंदू विवाह अधिनियम के तहत अदालत आ सकता है: छत्तीसगढ़ हाइकोर्ट
Amir Ahmad
6 March 2026 11:58 AM IST

छत्तीसगढ़ हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि यदि अनुसूचित जनजाति (एसटी) का कोई व्यक्ति स्वेच्छा से हिंदू रीति-रिवाज, परंपराएं और संस्कार अपनाता है तथा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करता है, तो उसे केवल इस आधार पर अधिनियम के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता कि इस कानून की धारा 2(2) सामान्यतः एसटी समुदाय पर लागू नहीं होती।
जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने यह स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि जनजातीय समुदाय का कोई सदस्य स्वयं को हिंदू मानते हुए हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करता है और उसी आधार पर अदालत के समक्ष आता है तो उसे प्रारंभिक स्तर पर ही इस कानून का लाभ लेने से रोका नहीं जा सकता।
अदालत ने कहा कि जब कोई व्यक्ति स्वेच्छा से हिंदू परंपराओं और संस्कारों को अपनाता है तो उसे हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता।
पूरा मामला
मामले में अपीलकर्ता पति-पत्नी ने वर्ष 2009 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया। पत्नी अनुसूचित जाति वर्ग से थी जबकि पति अनुसूचित जनजाति से संबंधित था। इसके बावजूद पति ने विवाह के समय हिंदू संस्कारों के अनुसार 'सप्तपदी' सहित सभी रस्में निभाईं।
दोनों के बीच मतभेद होने के बाद अप्रैल 2014 से वे अलग रहने लगे और अंततः आपसी सहमति से तलाक लेने का निर्णय किया। इसके लिए उन्होंने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत फैमिली कोर्ट बस्तर में याचिका दाखिल की।
हालांकि फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज की कि अधिनियम की धारा 2(2) के अनुसार यह कानून अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर लागू नहीं होता, इसलिए पति के एसटी होने के कारण इस कानून के तहत तलाक की याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।
इस आदेश के खिलाफ दोनों ने फैमिली कोर्ट एक्ट के तहत हाइकोर्ट में अपील दायर की।
हाइकोर्ट की टिप्पणी
हाइकोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2(2) वास्तव में संरक्षण का प्रावधान है न कि किसी को बाहर रखने का। यदि किसी जनजातीय समुदाय का सदस्य स्वयं इस कानून के तहत आना चाहता है और हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करता है, तो उसे रोका नहीं जा सकता।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि यदि अनुसूचित जनजाति के लोग व्यवहार में हिंदू परंपराओं का पालन करते हैं तो उत्तराधिकार जैसे मामलों में हिंदू कानून लागू हो सकता है।
हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि जब पक्षकार स्वयं हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह करते हैं और 'सप्तपदी' जैसे संस्कार निभाते हैं तो उन्हें केवल जनजातीय पहचान के आधार पर इस कानून के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता।
इन टिप्पणियों के साथ हाइकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया और मामले को वापस उसी अदालत में भेजते हुए निर्देश दिया कि वह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत दायर आपसी सहमति से तलाक की याचिका पर गुण-दोष के आधार पर फैसला करे।

