बिना तलाक दूसरी पत्नी के साथ रह रहे पिता को बच्चे की कस्टडी का अधिकार नहीं, आर्थिक क्षमता से ऊपर बच्चे का हित: छत्तीसगढ़ हाइकोर्ट

Amir Ahmad

21 Jan 2026 4:21 PM IST

  • बिना तलाक दूसरी पत्नी के साथ रह रहे पिता को बच्चे की कस्टडी का अधिकार नहीं, आर्थिक क्षमता से ऊपर बच्चे का हित: छत्तीसगढ़ हाइकोर्ट

    छत्तीसगढ़ हाइकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार रखा, जिसमें सात वर्षीय बच्चे की कस्टडी उसकी जैविक मां से पिता को सौंपने से इनकार कर दिया गया। हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना तलाक लिए दूसरी पत्नी के साथ रह रहा पिता बच्चे की कस्टडी का हकदार नहीं हो सकता और ऐसे मामलों में बच्चे का सर्वांगीण कल्याण सर्वोपरि होता है।

    जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने कहा कि चूंकि बच्चा जन्म से ही अपनी मां के साथ रह रहा है। उसे आवश्यक प्रेम, स्नेह व देखभाल मिल रही है, इसलिए उसकी कस्टडी बदलना उचित नहीं होगा।

    हाइकोर्ट ने टिप्पणी की,

    “इस न्यायालय को बच्चे के भविष्य के पहलू से आंखें मूंदकर नहीं देखा जा सकता। यह निश्चित नहीं है कि सौतेली मां के साथ बच्चे को वैसा ही प्रेम, स्नेह और अनुकूल वातावरण मिलेगा, जैसा उसे जन्म से अपनी मां से मिलता आ रहा है।”

    मामले में पिता ने यह तर्क दिया कि वह आर्थिक रूप से अधिक सक्षम है और बच्चे की जरूरतें बेहतर तरीके से पूरी कर सकता है। इस पर हाइकोर्ट ने हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 13(1) का हवाला देते हुए कहा कि अभिभावक नियुक्त करते समय सबसे महत्वपूर्ण पहलू बच्चे का कल्याण होता है।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आर्थिक संपन्नता को आधार बनाकर कस्टडी नहीं दी जा सकती। बच्चे का हित शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक सभी पहलुओं को संतुलित रूप से देखकर तय किया जाना चाहिए।

    बेंच ने कहा,

    “बच्चे का कल्याण न तो केवल आर्थिक समृद्धि से तय होता है और न ही केवल भावनात्मक जुड़ाव से। इसका निर्धारण सभी कारकों के संतुलन से होता है, जिससे बच्चे का समग्र विकास सुनिश्चित हो सके।”

    मामले की पृष्ठभूमि

    मामले के अनुसार पति-पत्नी का विवाह वर्ष 2013 में हुआ था और उनके दो पुत्र हैं। वैवाहिक विवाद उत्पन्न होने के बाद वर्ष 2021 में पत्नी अपने छोटे बेटे के साथ मायके चली गई। बाद में बड़ा बेटा भी मां के पास रहने लगा।

    इसके बाद पिता ने हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 6 के तहत बड़े बेटे की कस्टडी के लिए फैमिली कोर्ट में आवेदन किया। फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि पिता बिना पहली पत्नी से तलाक लिए दूसरी महिला के साथ रह रहा है, जो क्रूरता और दुराचार की श्रेणी में आता है।

    फैमिली कोर्ट के आदेश से असंतुष्ट होकर पिता ने हाइकोर्ट का रुख किया और कहा कि पत्नी की कोई आय नहीं है, इसलिए वह बच्चे की परवरिश ठीक से नहीं कर सकती। वहीं, मां ने यह दोहराया कि पिता दूसरी पत्नी के साथ रह रहा है, जिसे उसने जिरह के दौरान स्वयं स्वीकार भी किया है।

    हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही कानून के तहत पिता को प्राकृतिक संरक्षक माना गया हो लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। हर मामले में बच्चे के हित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

    इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाइकोर्ट ने पिता की अपील खारिज की और फैमिली कोर्ट का फैसला सही ठहराया।

    Next Story