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बच्चों की कस्टडी के मामले में हैबियस कॉर्पस की प्रवृत्त‌ि की रिट सुनवाई योग्य : मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
10 Jun 2020 3:57 PM GMT
Writ Of Habeas Corpus Will Not Lie When Adoptive Mother Seeks Child
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हाल ही में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की अनुमति दी, जो कि 2 साल के बच्चे की कस्टडी से संबंधित थी, जिसके पास अमेरिकी नागरिकता है।

पारिवारिक कानून सिद्धांत पर जोर देते हुए कि "बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है", ज‌स्टिस एससी शर्मा की बेंच ने इस मुद्दे की जांच की कि क्या एक नाबालिग बच्चे की कस्टडी के संबंध में हैबियस कॉर्पस याचिका बरकरार रह सकती है या नहीं, और कहा-

"मामले के अजीबोगरीब तथ्यों और परिस्थितियों में भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हैबियस कॉर्पस की प्रकृति में एक रिट जारी करने के लिए एक रिट याचिका निश्चित रूप से सुनवाई योग्य है। अन्यथा, बच्चे के कल्याण और बच्चे के साथ बातचीत समेत अन्य कारकों को ध्यान में रखते हुए भी, अदालत की राय है कि बच्चे को मां के पास होना चाहिए। "

पृष्ठभूमि

यह रिट 2 साल के बच्चे की मां ने दायर की है, जो अमेरिका में पैदा हुआ था और वहीं का नागरिक है।

याचिकाकर्ता के पति ने एक अमेरिकी अदालत से उसके खिलाफ एक्स-पार्टे रिस्ट्रेंट आदेश प्राप्त किया था, जिससे उसे अपनी ससुराल छोड़कर, अपने माता-पिता के घर इंदौर लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इसके बाद, याचिकाकर्ता के पति ने अपने बेटे को अपने माता-पिता (बच्चे के दादा दादी) के घर ग्वालियर में छोड़ दिया, और बच्चे की देखभाल करने के लिए, अपने माता-पिता के पक्ष में एक पावर ऑफ अटॉर्नी और प्राधिकरण निष्पादित किया।

याचिकाकर्ता ने अपने बच्चे को अपनी कस्टडी में लेने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था।

मेंटेंनबिलिटी

प्रतिवादी, यानी याचिकाकर्ता के ससुराल वालों ने दलील दी थी कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका बच्‍चे की कस्टडी के मामलों में मेंटेनेबल नहीं है। हालांकि, कोर्ट अधिकार क्षेत्र या या गार्डियन एंड वार्ड एक्ट, 1890 के तहत उपलब्ध वैकल्पिक उपाय के आधार पर याचिक को रद्द करने के पक्ष में नहीं था।

कोर्ट ने "हैबियस कॉर्पस की प्रकृति" पर कहा, "यह सच है कि बच्चा अमेरिकी नागरिक है, हालाँकि, मां भारतीय नागरिक है और उसे अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर करने और रिट जारी करने की प्रार्थना करने के लिए भारत के संविधान के तहत कानूनी अधिकार प्राप्त है।"

कोर्ट ने कैप्टन दुष्यंत सोमल बनाम सुषमा सोमल, (1981) 2 एससीसी 277 पर भरोसा किया, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को बच्चे की कस्टडी देने के निर्देश के साथ हैबियस कॉर्पस की प्रकृति में रिट की अनुमति दी थी।

कोर्ट ने कहा, वर्तमान मामले में, "बच्चा लगभग दो वर्ष का है और हिंदू माइनोरिटी एंड गार्ड‌ियनश‌िप एक्ट, 1956 की धारा 6 को ध्यान में रखते हुए इस कोर्ट का मानना है कि बच्चे को मां की कस्टडी में दिया जाए।"

अदालत ने हालांकि स्पष्ट किया कि यदि पक्षकार गार्ड‌ियन एंड वार्ड एक्ट, 1890 के तहत सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहते हैं तो उसका आदेश उनके रास्ते में नहीं आएगा।

पीठ ने स्पष्ट किया, "इस मामले में पिता/ दादा-दादी के मुलाकात अधिकारों के संबंध में वैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए इस न्यायालय के आदेश से प्रभावित हुए बिना सिविल कोर्ट अपने निर्णय देने के लिए स्वतंत्र होगा।"

अमेरिकी कोर्ट द्वारा दिया गया संयम का आदेश, याचिकाकर्ता को बच्चे की कस्टडी के अधिकार से वं‌चित नहीं करता है

उत्तरदाताओं ने तर्क दिया था कि फ्रैंकलिन काउंटी कॉमन प्लीस कोर्ट, डिवीजन ऑफ डोमेस्टिक रिलेशंस, कोलंबस, ओहियो (यूएसए) द्वारा याचिकाकर्ता के खिलाफ दी गई निषेधाज्ञा के संदर्भ में याचिकाकर्ता बच्चे की कस्टडी पाने का हकदार नहीं है।

इस दलील को खारिज करते हुए पीठ ने कहा कि एक्स-पार्टे निषेधाज्ञा आदेश कहीं भी मां को बच्चे से मिलने या बच्चे को अपने साथ रखने से नहीं रोकता है। इसके अलावा, कोई ऐसा आदेश रिकॉर्ड पर नहीं रखा गया, जो बच्चे की हिरासत को पिता के पास रहने का निर्देश देता है।

यह देखा,

"संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित किसी भी न्यायालय द्वारा ऐसी निषेधाज्ञा आदेश नहीं दिया गया है जो बच्चे की कस्टडी को पिता के पास रखने का निर्देश देता है। तथाकथित निषेधाज्ञा आदेश भी एक एक्स-पार्टे आदेश है। निषेधाज्ञा आदेश में बच्चे के बारे में कहीं भी उल्लेख नहीं है। घरेलू हिंसा यानी डोमेस्टिक वॉयलेंस सिविल प्रोटेक्शन ऑर्डर (CPO एक्स पार्टे ) के संबंध में पति को पत्नी के खिलाफ निषेधाज्ञा प्राप्त हो सकती है, लेकिन यह निश्चित रूप से बच्चे की कस्टडी के संबंध में आदेश नहीं है और इसलिए, तथाकथित नागरिक सुरक्षा आदेश किसी भी तरीके से दादा-दादी की मदद नहीं करता।"

अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि बच्चा अपनी मां से बहुत प्यार करता है, जिस पर कहा गया कि,

"मां के प्यार के बराबर कुछ भी नहीं है। अपने बच्चे के लिए मां के प्यार को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। यह कानून द्वारा प्रदान की गई सीमाओं से परे है और यही कारण है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि बच्चों की हिरासत से संबंधित मामले में बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है।"

बाल अभिरक्षा के मामलों में पॉवर ऑफ अटॉर्नी और प्राधिकरण की शक्ति अप्रासंगिक है

अदालत ने कहा कि बच्चे की दादा-दादी के पक्ष में प्रतिवादी-पति द्वारा निष्पादित पावर ऑफ अटॉर्नी और प्राधिकरण, बच्चे की देखभाल करने के लिए भारतीय अदालतों में एक "अनसुनी अवधारणा" है।

"भारत में गार्ड‌ियन एंड वार्ड एक्ट, 1890 के तहत अभिभावकों की नियुक्ति के लिए एक निर्धारित प्रक्रिया है। याचिकाकर्ता के पति द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया, पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर बच्चे को रखने के लिए दादा-दारी को अधिकृत करना अनसुना है। इससे उत्तरदाताओं 4 और 5 के पक्ष में कोई अधिकार नहीं बनता है।"

इसी के अनुसार, अदालत ने रिट याचिका की अनुमति दी। कोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि विचाराधीन बच्चा अमेरिकी नागरिक है, इसलिए अमेरिकी दूतावास और केंद्रीय विदेश मंत्रालय के आदेश के बारे में सूचित किया जाएगा।

मामले का विवरण:

केस : अनुश्री गोयल बनाम मध्य प्रदेश व अन्य।

केस नं : WP नंबर 7739/2020

कोरम: जस्टिस एससी शर्मा

प्र‌तिनिधित्व: एडवोकेट हितेश शर्मा (याचिकाकर्ता के लिए); अतिरिक्त महाधिवक्ता पुष्यमित्र भार्गव (राज्य के लिए); आरएस छाबड़ा (उत्तरदाताओं के लिए)

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