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पत्नी कमाने में सक्षम है, यह अंतरिम भरण-पोषण से इनकार करने का आधार नहीं, कई बार पत्नियां केवल परिवार के लिए अपना करियर छोड़ देती हैं: दिल्ली हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
23 Dec 2021 10:27 AM GMT
पत्नी कमाने में सक्षम है, यह अंतरिम भरण-पोषण से इनकार करने का आधार नहीं, कई बार पत्नियां केवल परिवार के लिए अपना करियर छोड़ देती हैं: दिल्ली हाईकोर्ट
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दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि तथ्य यह है कि पत्नी कमाने में सक्षम है, यह अंतरिम भरण-पोषण से इनकार करने का आधार नहीं है क्योंकि कई बार पत्नियां केवल परिवार के लिए अपना करियर छोड़ देती हैं।

न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने यह भी देखा कि सीआरपीसी की धारा 125 का उद्देश्य एक ऐसी महिला की पीड़ा और वित्तीय पीड़ा को कम करने के लिए है जो अपना वैवाहिक घर छोड़ चुकी है और उसे और उसके बच्चे के भरण-पोषण के लिए कुछ व्यवस्था की जा सके।

यह टिप्पणी तब आई जब पीठ एक भारतीय सेना के कर्नल पति द्वारा दायर आपराधिक रिवीजन याचिका पर विचार कर रही थी, जिसमें फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें उसे अपनी पत्नी को 33,500 रुपये मासिक भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

याचिकाकर्ता पति का मामला था कि पत्नी द्वारा तथ्यों को छिपाने के परिणामस्वरूप आदेश में स्पष्ट विसंगतियां हैं। तर्क दिया गया कि पत्नी को भरण-पोषण दिए जाने से अयोग्य ठहराया जाना चाहिए क्योंकि वह एक व्यभिचारी संबंध में थी और अपने सेना के वरिष्ठों में से एक के साथ व्यभिचार में रह रही थी।

यह भी प्रस्तुत किया गया कि पत्नी को इस आधार पर भरण-पोषण प्राप्त करने से अयोग्य ठहराया जाना चाहिए कि वह पहले एक शिक्षिका के रूप में कार्यरत थी और जीविकोपार्जन कर रही थी।

दूसरी ओर, प्रतिवादी पत्नी ने प्रस्तुत किया कि यह प्रेमहीन विवाह था, जिसने उसे पति के खिलाफ तलाक, कस्टडी और भरण-पोषण की कार्यवाही शुरू करने का सहारा लिया। यह भी प्रस्तुत किया गया कि आदेश में कोई दकमी नहीं है और पुनरीक्षण याचिका में कोई मैरिट नहीं है।

अदालत ने देखा,

"सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कई निर्णयों में सीआरपीसी की धारा 125 का उद्देश्य निर्धारित किया गया है। सीआरपीसी की धारा 125 का उद्देश्य एक परित्यक्त पत्नी को भोजन, वस्त्र और आश्रय प्रदान करके उसकी सहायता करना है।"

यह भी कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 में घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत कार्यवाही जैसी अन्य कार्यवाही में भरण-पोषण तय करने से पहले सीआरपीसी की धारा 125 के तहत विचार किया जाना चाहिए।

अदालत ने शुरुआत में कहा,

"यह नहीं कहा जा सकता है कि सेना का आदेश सीआरपीसी की धारा 125 के प्रावधानों से आगे निकल जाएगा और सेना के जवान केवल सेना के आदेश के तहत आते हैं और सीआरपीसी की धारा 125 सेना के कर्मियों पर लागू नहीं होगी।"

कोर्ट ने कहा,

"तथ्य यह है कि प्रतिवादी कमाई करने में सक्षम है, यहां प्रतिवादी को अंतरिम भरण-पोषण से इनकार करने का कोई आधार नहीं है। कई बार पत्नियां केवल परिवार के लिए अपने करियर का छोड़ देती हैं।"

अदालत का विचार है कि पत्नी के व्यभिचार करने या व्यभिचार में रहने के आरोप को निर्णायक रूप से साबित नहीं किया जा सका है और उक्त मुद्दे का फैसला दोनों पक्षों के साक्ष्य के बाद ही किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा,

"यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि यदि यह निर्णायक रूप से साबित हो जाता है कि प्रतिवादी व्यभिचार में रह रही थी और वह भरण-पोषण की बिल्कुल भी हकदार नहीं है, तो विचारण न्यायालय भरण-पोषण राशि की वापसी के लिए उचित आदेश पारित कर सकता है। कोर्ट को सीआरपीसी की धारा 125 के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए फैसला करना होगा।"

कोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए पति को दिनांक 01.01.2017 से पत्नी को अंतरिम भरण पोषण के रूप में 14,615 रुपए प्रति माह भुगतान करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने कहा कि वह उस आदेश के हिस्से को बाधित करने के लिए इच्छुक नहीं है, जिसमें पति को याचिका दायर करने की तिथि दिसंबर, 2016 तक पत्नी को प्रति माह 9,000 रुपये की राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।

केस का शीर्षक: कर्नल रामनेश पाल सिंह बनाम सुगंधी अग्रवाल


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