सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में जब जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक लगाने से इनकार किया
LiveLaw Network
13 Oct 2026 9:42 AM IST

दिल्ली पुलिस ने सोमवार (12 अक्टूबर) को जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन के लिए तय जगह की सूची से हटा दिया और शहर में विरोध प्रदर्शन या रैली आयोजित करने के लिए तीन नई जगहों – रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और CBD ग्राउंड ईस्ट दिल्ली – का ऐलान किया।
उल्लेखनीय है कि आठ साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने 'मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ' (2018) मामले में फैसला सुनाया कि सेंट्रल दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जा सकती। साथ ही कोर्ट ने यह भी माना था कि "भीड़-भाड़ वाले इलाके" में स्थित रामलीला मैदान शायद विरोध प्रदर्शनों की ज़रूरतों को पूरा न कर पाए।
इस मामले में कोर्ट 'मज़दूर किसान शक्ति संगठन' की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें CrPC की धारा 144 के तहत मनमाने और बार-बार लगाए जाने वाले आदेश को चुनौती दी गई। इस आदेश के ज़रिए जंतर-मंतर को किसी भी तरह की जनसभा, धरने या शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित कर दिया गया।
कोर्ट ने इसके साथ ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के फैसले को चुनौती देने वाली अपीलों पर भी सुनवाई की। NGT ने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे जंतर-मंतर रोड पर सभी तरह के धरने, विरोध प्रदर्शन, आंदोलन, लोगों के जमा होने, सार्वजनिक भाषणों और लाउडस्पीकर के इस्तेमाल आदि को तुरंत रोक दें।
NGT ने आदेश दिया कि प्रदर्शनकारियों को तुरंत रामलीला मैदान, अजमेरी गेट स्थित दूसरी जगह पर भेज दिया जाए। NGT का यह फैसला उन निवासियों की याचिकाओं पर आया था, जिन्होंने जंतर-मंतर पर होने वाले विरोध प्रदर्शनों से होने वाली परेशानियों की शिकायत की थी।
विरोध प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक लगाना समाधान नहीं है: 2018 में SC का कहना
NGT के आदेश की समीक्षा करते हुए जस्टिस एके सिकरी और जस्टिस अशोक भूषण की बेंच ने 2018 के अपने फैसले में विरोध प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक लगाने को गलत बताया और संतुलित तरीका अपनाने की बात कही।
हालांकि बेंच ने निवासियों को होने वाली परेशानियों के बारे में NGT के विश्लेषण का समर्थन किया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि पूरी तरह रोक लगाना समाधान नहीं हो सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा,
"NGT के सामने पक्षों ने जो विरोधी रुख अपनाया, उसमें NGT ने ज़मीनी हकीकत और ऐसे प्रदर्शनों की वजह से निवासियों को होने वाली बुरी हालत को ध्यान में रखा। हालांकि NGT का यह विश्लेषण बिल्कुल सही है, फिर भी हमें लगता है कि इसका समाधान प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक लगाना नहीं था। इसके बजाय, NGT अधिकारियों को ऐसे उपाय अपनाने का निर्देश दे सकता था (जिनमें से कुछ हमने ऊपर बताए हैं) ताकि समाज के दोनों वर्गों के अधिकारों के बीच संतुलन बना रहे।"
दिलचस्प बात यह है कि कोर्ट याचिकाकर्ता की इस दलील से भी कुछ हद तक सहमत था कि असरदार होने के लिए विरोध प्रदर्शन सत्ता के केंद्र के पास किसी इलाके में होने चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया के आने के बाद, शारीरिक रूप से पास होना शायद ज़रूरी शर्त न रहे।
कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि कोई व्यक्ति किसी खास जगह पर विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार पर ज़िद नहीं कर सकता।
आगे कहा गया,
"इस बात पर ज़ोर दिया गया कि ऐसे प्रदर्शन करने और नारे लगाने का मकसद यह होता है कि वे उन संबंधित लोगों तक पहुँचें जिनके लिए वे किए जा रहे हैं। यह बात सही हो सकती है। हालांकि, यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि हम टेक्नोलॉजी के दौर में जी रहे हैं, जहां लोगों के किसी समूह की आवाज़ कई तरीकों से सही जगहों तक पहुंच सकती है। इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया अहम भूमिका निभाते हैं। फिर हमारे पास सोशल मीडिया और 'WhatsApp', 'Twitter', 'Instagram' जैसे कई ऐप हैं जो ऐसी घटनाओं को फैलाने में ज़रा भी समय नहीं लेते।
दूसरी बात, हालांकि विरोध प्रदर्शन करना एक स्वीकृत अधिकार है, लेकिन साथ ही, कोई यह दावा नहीं कर सकता कि मुझे सिर्फ़ एक खास इलाके में ही प्रदर्शन करने का अधिकार है।"
कोर्ट ने कहा कि जनहित में ऐसे प्रदर्शनों को रेगुलेट करते समय, खास इलाके तय किए जा सकते हैं। हालांकि, उसने यह भी माना कि "रामलीला मैदान इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए शायद काफ़ी न हो"।
कोर्ट ने कहा था,
"पुरानी दिल्ली में यह जगह बहुत भीड़-भाड़ वाले इलाके का हिस्सा है। ऐसे कामों के लिए इस जगह का इस्तेमाल करने की अपनी सीमाएं हैं। इसलिए, किसी दूसरी जगह की ज़रूरत है।"
कोर्ट ने माना कि चूंकि अधिकारियों ने जंतर-मंतर को चुना था और "यह काफी समय से इस्तेमाल में रहा है", इसलिए शांतिपूर्ण जनसभाओं, जुलूसों आदि के लिए इस जगह के एक सीमित हिस्से का इस्तेमाल करने की इजाज़त देकर संतुलन बनाया जा सकता है। यह इजाज़त कम से कम छोटे समूहों को इस तरह दी जा सकती है कि स्थानीय निवासियों को कोई परेशानी या असुविधा न हो।
इस तरह कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया कि वे संबंधित एजेंसियों के साथ मिलकर जंतर-मंतर इलाके में विरोध प्रदर्शनों के सीमित आयोजन के लिए एक उचित तरीका बनाएं। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करें कि प्रदर्शनों आदि को इस तरह से नियंत्रित किया जाए कि जंतर-मंतर रोड के निवासियों या वहां स्थित कार्यालयों को कोई परेशानी न हो। कोर्ट ने कहा था कि इस पहलू पर "विस्तृत दिशानिर्देश" बनाए जा सकते हैं। कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया था कि "किसी खास समूह द्वारा ऐसे प्रदर्शन के आयोजन के लिए पुलिस कमिश्नर (या उनके द्वारा अधिकृत अधिकारी) से ज़रूरी पूर्व अनुमति लेने" का प्रावधान बनाया जाए।
गौरतलब है कि पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस बात पर विचार करने को कहा था कि क्या जंतर-मंतर की जगह शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के लिए किसी दूसरी जगह को तय किया जाना चाहिए। कोर्ट ने इस सुझाव पर विचार करने को कहा था कि प्रदर्शनकारियों के लिए ज़रूरी सुविधाओं वाली एक वैकल्पिक जगह की पहचान की जानी चाहिए।
कोर्ट ने यह निर्देश तब दिया जब दिल्ली में एंटी-CEC/SIR विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि सक्षम अधिकारी शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के लिए जंतर-मंतर के अलावा किसी दूसरी जगह को तय करने पर विचार करेंगे और उन्होंने इस बयान को आदेश में दर्ज करने का अनुरोध किया।

