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बिक्री के अपंजीकृत अनुबंध को संपार्श्विक प्रयोजन के लिए साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

LiveLaw News Network
8 Sep 2019 1:53 PM GMT
बिक्री के अपंजीकृत अनुबंध को संपार्श्विक प्रयोजन के लिए साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है, सुप्रीम कोर्ट का फैसला
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उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में ट्रायल कोर्ट के एक आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें वादी को सौदे की बयाना राशि की वसूली के लिए अपने मुकदमे में बिक्री के अपर्याप्त रूप से स्टाम्प किये गए अपंजीकृत समझौते पर सबूत देने की अनुमति दी गयी। यह बयाना राशि कथित तौर पर बिक्री के लिए समझौते को निष्पादित करने के समय उसके द्वारा भुगतान किया गया था।

शीर्ष अदालत के समक्ष मुद्दा यह था कि क्या बिक्री के एक अपंजीकृत समझौते को पंजीकरण अधिनियम 1908 की धारा 49 के तहत संपार्श्विक उद्देश्यों (collateral purposes) के लिए देखा जा सकता है। पीठ, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील पर विचार कर रही थी, जिसने ट्रायल कोर्ट द्वारा अविनाश कुमार चौहान बनाम विजय कृष्ण मिश्रा के मामले में दिए गए फैसले को पलट दिया था।

प्रकाश साहू बनाम सौल में न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा और न्यायमूर्ति बी. आर. गवई की पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने एस. कलादेवी बनाम वी. आर. सोमसुंदरम के निर्णय के मद्देनज़र, वादी को अपर्याप्त रूप से स्टाम्प किये गए दस्तावेज़ को लेकर सबूत देने की अनुमति दी। उक्त निर्णय में इसे निम्न प्रकार से रखा गया था:

• पंजीकृत होने की आवश्यकता वाले दस्तावेज, यदि अपंजीकृत हैं तो वे पंजीकरण अधिनियम की धारा 49 के तहत साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किये जा सकते।

• इस तरह के अपंजीकृत दस्तावेज़ को हालांकि संपार्श्विक (वो संपत्ति या धन, जिसे ऋण लेने वाला व्यक्ति गारंटी के तौर पर प्रयोग करता है) उद्देश्य के प्रमाण के रूप में उपयोग किया जा सकता है, जैसा कि पंजीकरण अधिनियम की धारा 49 में प्रदान किया गया है।

• एक संपार्श्विक लेन-देन को, उस लेनदेन से स्वतंत्र होना चाहिए जिसे कानून के अंतर्गत पंजीकरण की आवश्यकता है।

• एक संपार्श्विक लेन-देन को, एक ऐसा लेनदेन होना चाहिए जिसे स्वयं एक पंजीकृत दस्तावेज द्वारा प्रभावित होने की आवश्यक नहीं है, अर्थात ऐसा कोई लेन-देन, जो 100 रुपये और उससे अधिक के मूल्य की अचल संपत्ति में, किसी भी अधिकार, टाइटल या इंटरेस्ट का निर्माण करता हो।

• यदि कोई दस्तावेज़, अपंजीकृत होने के चलते साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है, तो उसकी किसी भी शर्त को साक्ष्य में स्वीकार नहीं किया जा सकता है और एक महत्वपूर्ण खंड को साबित करने के उद्देश्य के लिए एक दस्तावेज का उपयोग करना, उसे संपार्श्विक उद्देश्य के रूप में उपयोग करना नहीं होगा।

• पंजीकृत होने की आवश्यकता वाला दस्तावेज, यदि अपंजीकृत है, तो स्पेसिफिक परफॉरमेंस के लिए एक सूट में, उसे एक अनुबंध के प्रमाण के रूप में साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

उच्च न्यायालय के आदेश को पलटते हुए, पीठ ने देखा: उच्च न्यायालय, यह प्रतिपादित करते हुए कि अपंजीकृत दस्तावेज को संपार्श्विक उद्देश्यों के लिए विचार में नहीं लिया जा सकता है, पूर्वोक्त पर विचार करने में विफल रहा।



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