किशोर होने की याचिका: सुप्रीम कोर्ट ने 17 साल जेल की सजा काटने वाले 'हत्या के दोषी' को रिहा किया

  • सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली

    सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने किशोर होने की याचिका को स्वीकार करते हुए हत्या के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद 17 साल की सजा काटने वाले एक व्यक्ति को रिहाई दी।

    संजय पटेल को 16 मई 2006 को सत्र न्यायालय ने दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

    उनके द्वारा दायर अपील को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में स्पेशल लीव पिटीशन को भी खारिज कर दिया था।

    2021 में, उन्होंने एक विविध आवेदन दायर किया जिसमें कहा गया कि उनकी जन्म तिथि 16 मई 1986 है और इसलिए, अपराध करने की तिथि पर, वह एक किशोर थे। उसने इस संबंध में हाई स्कूल और इंटरमीडिएट शिक्षा बोर्ड, उत्तर प्रदेश द्वारा घोषित हाई स्कूल के परिणाम जैसे विभिन्न दस्तावेजों पर भरोसा जताया।

    इस वर्ष की शुरुआत में, न्यायालय ने किशोर न्याय बोर्ड, जिला महाराजगंज को आवेदक के इस दावे की जांच करने का निर्देश दिया कि वह अपराध करने की तिथि पर किशोर था।

    किशोर न्याय बोर्ड ने एक आदेश पारित किया जिसमें कहा गया कि आवेदक की सही जन्म तिथि 16 मई 1986 है और इसलिए, अपराध करने की तिथि पर, उसकी आयु 17 वर्ष 07 महीने और 23 दिन थी।

    अदालत ने कहा कि जब अपराध किया गया था, वह किशोर था। इसलिए किशोर न्याय (देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2000 के प्रावधान लागू होंगे।

    कोर्ट ने कहा,

    "अधिनियम 2000 के अनुसार, केवल उसकी धारा 4 के तहत गठित किशोर न्याय बोर्ड के पास कानून के उल्लंघन में एक किशोर पर मुकदमा चलाने का अधिकार क्षेत्र था। अधिनियम 2000 की धारा 7 ए के तहत है। मामले के अंतिम निपटान के बाद भी एक आरोपी किसी भी अदालत के समक्ष किशोर होने का दावा करने का हकदार है। इस तरह के दावे को 2000 अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार निर्धारित करने की आवश्यकता है। धारा 7 ए की उपधारा (2) बशर्ते कि अगर जांच करने के बाद, अदालत ने आरोपी को पाया अपराध करने की तिथि पर किशोर, न्यायालय उचित आदेश पारित करने के लिए किशोर न्याय बोर्ड को किशोर को अग्रेषित करने के लिए एक जनादेश के तहत था।धारा 7A की उपधारा (2) आगे प्रदान करती है कि ऐसे मामले में, आपराधिक द्वारा पारित सजा न्यायालय का कोई प्रभाव नहीं माना जाएगा। सक्षम किशोर न्याय बोर्ड द्वारा इस मामले में दर्ज किए गए स्पष्ट निष्कर्ष को देखते हुए, जो कि दस्तावेजी साक्ष्य पर आधारित है, धारा 7 ए की उप-धारा (2) के मद्देनजर आवेदक को किशोर न्याय बोर्ड को भेजा जाना आवश्यक है। 2000 अधिनियम की धारा 15 के तहत, आवेदक के खिलाफ सबसे कठोर कार्रवाई जो 3 की जा सकती है, वह आवेदक को तीन साल की अवधि के लिए एक विशेष गृह में भेजना है।"

    अदालत ने 17 साल 03 दिन की सजा भुगतने की बात को संज्ञान में लेते हुए कहा कि आवेदक को किशोर न्याय बोर्ड के पास भेजना अन्याय होगा। इसलिए अदालत ने निर्देश दिया कि उसे तुरंत रिहा किया जाए बशर्ते कि उसे सक्षम न्यायालय के किसी अन्य आदेश के तहत हिरासत में लेने की आवश्यकता न हो।

    मामले का विवरण

    संजय पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य | 2022 लाइव लॉ (एससी) 369 | एम.ए.नं.1997 ऑफ 2021 | 13 अप्रैल 2022

    कोरम: जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस अभय एस. ओक

    आदेश की कॉपी यहां पढ़ें:


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