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यूएपीए- " कथित कृत्य और जब्त की गई संपत्ति के बीच कनेक्शन की अनुपस्थिति में यह नहीं माना जा सकता कि संपत्तियों को आतंकवादी कृत्य के तहत जब्त किया गया": पटना हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
25 March 2021 7:28 AM GMT
यूएपीए-  कथित कृत्य और जब्त की गई संपत्ति के बीच कनेक्शन की अनुपस्थिति में यह नहीं माना जा सकता कि संपत्तियों को आतंकवादी कृत्य के तहत जब्त किया गया: पटना हाईकोर्ट
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पटना हाईकोर्ट ने सोमवार को कहा कि गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत कथित कृत्य और जब्त की गई संपत्ति के बीच किसी भी कनेक्शन की अनुपस्थिति में यह नहीं माना जा सकता है कि संपत्तियों को आतंकवादी कृत्य के तहत जब्त किया गया था।

न्यायाधीश बीरेंद्र कुमार एकल की बेंच ने यह अवलोकन किया। दरअसल, कोर्ट के समक्ष नामित प्राधिकरण के उस आदेश को चुनौती देते हुए आरोपी के परिवार के सदस्यों की ओर से याचिका दायर की गई, जिसमें प्राधिकरण ने यूएपीए की धारा 25 के तहत संपत्तियों की जब्ती के संबंध में जो आरोपी पर लगे कथित आरोपों के साथ जुड़ा नहीं था, उसे भी जब्त करने की पूर्व अनुमति दी थी।

मामला

यह मामला वर्ष 2012 है, इसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 414, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम की धारा 10 और धारा 13 और आर्म्स एक्ट की धारा (1-AA) / (1-AAA), 26 (2) और 35 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।

अभियोजन का मामला था कि आरोपी कुंदन मुंडल द्वारा अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर नक्सलियों को हथियार और विस्फोटक की आपूर्ति करने की सूचना मिली थी। पुलिस ने देखा कि एक वाहन लेन में प्रवेश कर रहा था, लेकिन जैसे ही उन्होंने पुलिस को देखा तो वाहन से तीन व्यक्ति भाग गए।

हालांकि, गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों के पास से ज्यादा कुछ भी बरामद नहीं हुआ, लेकिन एक पिस्तौल और कुछ अन्य सामान बरामद किया गया। इन सामाने के कागज आरोपी दिखाने में असफल रहे। पुलिस ने वाहन से कुछ नक्सली साहित्य भी जब्त किया जिसे बाद गिरफ्तार लोगों ने स्वीकार किया कि वे नक्सलियों को हथियार सप्लाई करते थे।

पुलिस ने अगले दिन यानी 26 जुलाई 2012 को मंडल के घर की तलाशी ली और लैपटॉप, नकदी, एटीएम कार्ड, पैन कार्ड आदि कुछ सामान जब्त किए । इसके बाद 26 अगस्त 2012 को मामले में तीसरी बार जब्ती की गई।

जांच अधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने दिनांक 21 अगस्त 2012 को पत्र लिखा, जिसमें नामित प्राधिकारी से जब्ती की पूर्व मंजूरी लेनी थी, यूएपीए की धारा 25 के तहत जांच अधिकारी द्वारा जब्ती के लिए डीजीपी की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है।

दिनांक 17 अक्टूबर 2012 को नामित प्राधिकारी सह प्रधान सचिव, बिहार सरकार द्वारा जो जब्ती की पुष्टि की गई थी, उसे सत्र न्यायाधीश के समक्ष चुनौती दी गई, जिसमें न्यायालय ने इस आधार पर अपील को खारिज कर दिया था कि प्राधिकृत अधिकारी के आदेश के खिलाफ अपील का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। इसके बाद पीड़ित-याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय के समक्ष इस आदेश को चुनौती दी।

कोर्ट का अवलोकन

कोर्ट ने कहा कि यह स्पष्ट है जांच अधिकारी जब्ती की शक्ति का प्रयोग तभी कर सकता है जब यूएपीए अधिनियम के अध्याय IV के तहत अपराध किया गया हो। कोर्ट ने आगे कहा कि इस मामले में आरोपी के खिलाफ इस तरह के अपराध का कोई मामला नहीं है। इसलिए जांच अधिकारी द्वारा की गई संपत्ति की जब्ती अवैध और अधिकार क्षेत्र के बाहर था।

बेंच ने कहा कि,

"यूएपीए अधिनियम की धारा 25 के तहत जांच अधिकारी के पास यह विश्वास करने का कारण होना चाहिए कि किसी भी संपत्ति जिसके संबंध में जांच की जा रही है वह आतंकवाद की कार्यवाही से जुड़ी हुई है। विश्वास करने का कारण विशेष, विश्वसनीय और प्रासंगिक जानकारी के आधार पर होना चाहिए।"

कोर्ट ने आगे कहा कि प्रस्तुत पुलिस रिपोर्ट में कोई बी विशेष, विश्वसनीय या प्रासंगिक जानकारी नहीं मिली जिससे यह विश्वास किया जा सके कि जब्त की गई संपत्ति आतंकवाद की कार्यवाही थी।

कोर्ट ने कहा कि,

"कथित कृत्य और जब्त की गई संपत्ति के बीच किसी भी तरह के संबंध की अनुपस्थिति में यह नहीं माना जा सकता है कि संपत्तियों को आतंकवादी कृत्य के तहत जब्त किया गया था।"

कोर्ट ने अंत में कहा कि,

"यूएपीए अधिनियम की धारा 10 के तहत गैरकानूनी एसोसिएशन के सदस्य को दंडित करने के लिए यह स्थापित किया जाना आवश्यक है कि एसोसिएशन को यूएपीए अधिनियम की धारा 3 के तहत जारी अधिसूचना द्वारा गैरकानूनी घोषित किया गया था।। वर्तमान मामले में इस बात का कोई सबूत नहीं है कि आरोपी किस गैरकानूनी एसोसिएशन को हथियार सप्लाई कर रहा था। इसलिए यह पता नहीं लगाया जा सकता है कि क्या उस एसोसिएशन को गैरकानूनी एसोसिएशन घोषित किया गया है या नहीं। इसी तरह यूएपीए अधिनियम की धारा 13 जो गैरकानूनी गतिविधियों के लिए सजा प्रदान करती है, वर्तमान मामले में गैरकानूनी एसोसिएशन की पहचान के अभाव में प्रथम दृष्टया का मामला नहीं बनता है।"

कोर्ट ने इसलिए जब्ती करने, पुष्टि के आदेश और निचली अपीलीय अदालत के आदेश को पलटा और 10 दिनों के भीतर जब्त की गई संपत्ति को याचिकाकर्ता को वापस लौटाने का आदेश दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने आदेश में कहा कि इसमें प्रत्येक देरी होने पर प्राधिकरण द्वारा याचिकाकर्ता को 10,000 रूपये मुआवजे के रूप में भुगतान करना होगा।

आदेश की कॉपी यहां पढ़ें:



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