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समय पर जागरूकता स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के काम में बाधा डालने वालों पर एनएसए लगाने जैसे कठोर कदम उठाने से बचा सकती है : बॉम्बे हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
12 April 2020 4:45 AM GMT
समय पर जागरूकता स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के काम में बाधा डालने वालों पर एनएसए लगाने जैसे कठोर कदम उठाने से  बचा सकती है : बॉम्बे हाईकोर्ट
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बॉम्बे हाईकोर्ट (औरंगाबाद पीठ) ने कहा है कि समय पर जागरूकता के लिए कदम उठाने से COVID-19 का इलाज करने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के काम में बाधा डालने वालों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत कार्रवाई करने जैसे ''कठोर उपायों'' से बचा जा सकता है।

न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वारले ने इंदौर में स्वास्थ्य कर्मियों पर हमला करने वाले व्यक्तियों के खिलाफ एनएसए लगाने के मामले में मीडिया में आई खबरों पर ध्यान देते हुए यह टिप्पणी की है।

पीठ ने कहा कि

''यह बताने के लिए किसी अंकगणितीय परिशुद्धता की आवश्यकता नहीं है कि यदि स्वास्थ्य कर्मियों को उनके कर्तव्यों से रोका जाएगा तो इसके लिए भारी कीमत चुकानी होगी। समय पर उपाय और चिकित्सा सहायता आज के समय की जरूरत है। ऐसे मामलों को देखते हुए यह न्यायालय एक सुझाव दे रहा है। क्यों न इस कठिन समय में उन स्वतंत्र निकायों /संगठनों के माध्यम से जागरूकता लाने का प्रयास किया जाए, जिन्होंने समाज में अपने बहुमूल्य योगदान के कारण प्रतिष्ठा हासिल की है।

इसी के साथ समाज के विभिन्न वर्गों से संबंधित समाज के सम्मानित लोगों की भी इस काम में सहायता ली जा सकती है ताकि आम जनता से अपील की जा सके कि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को सर्वेक्षण करने सहित उचित कदम उठाने की अनुमति दें या उनके काम में अड़चन पैदा न करें। इस तरह के प्रयास से स्वास्थ्य अधिकारियों को पाॅजिटिव मामलों का पता लगाने में मदद मिलेगी और रोगियों को उपचार प्रदान करने के लिए तत्काल कदम उठाने होंगे ताकि नागरिकों और देशवासियों के मूल्यवान जीवन को बचाया जा सके।''

हालांकि, न्यायालस ने एनएसए लगाने के कदम को 'कठोर उपाय' करार दिया। जो कि सक्षम प्राधिकारी के समक्ष सवाल उठाने पर एक मुद्दा हो सकता है। जज ने कहा कि समय पर कदम उठाने से इस तरह के कठोर उपायों से बच सकते हैं।

पीठ ने यह भी कहा कि

''मेरी राय में, यदि सक्षम न्यायिक मंच के समक्ष निर्णय के लिए मामले को उठाया जाए तो राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 के प्रावधानों को लगाने के लिए उपयुक्तता एक मुद्दा होगी। लेकिन यदि समय पर कदम उठाए जाते हैं, तो प्रशासन को इस तरह के प्रावधानों के आह्वान या लागू करने का कोई अवसर ही नहीं मिलेगा। अगर इस न्यायालय द्वारा ऊपर बताए गए तरीकों के बारे में विचार किया जाए तो ऐसे कठोर उपायों को लागू करने की स्थिति से बचा जा सकता है।''

न्यायालय ने प्रवासी मजदूरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों और स्वयंसेवकों के सामने आने वाली कठिनाइयों के बारे में विभिन्न अखबारों में प्रकाशित कई खबरों पर भी संज्ञान लिया। वहीं राज्य के प्रशासन और स्थानीय नगरपालिका अधिकारियों को नोटिस भी जारी किया।

अदालत ने समाचार पत्र 'लोकमत', 'शकाल' और 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' में छपी खबरों के हवाले से कुछ मजदूरों को हिरासत में लिए जाने के मामले का भी जिक्र किया। जो देश में लॉकडाउन घोषित होने के चलते पुणे और अहमदनगर से पैदल ही मध्य प्रदेश राज्य जा रहे थे।

इन समाचार पत्रों में छपी खबरों में बताया गया था कि लगभग 28 मजदूरों ने लगभग 200 किलोमीटर की पैदल यात्रा की या परिवहन के उन साधनों की सहायता,जो भी इनको रास्ते में मिले। परंतु इन्हें पुलिस ने हिरासत में ले लिया गया। इसके बाद इन मजदूरों को जिला परिषद स्कूल में आश्रय प्रदान किया गया। इन खबरों में यह भी बताया गया था कि इसके बाद स्वैच्छिक संगठनों के माध्यम से इन मजदूरों के लिए भोजन की कुछ व्यवस्थाएं भी की गई। इसके अलावा, तालुका स्तर पर गठित आपदा प्रबंधन टीम के माध्यम से भी सेवाएं प्रदान की जा रही हैं। लेकिन स्वयंसेवकों को सुविधाओं और संचार की कमी के कारण कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।

न्यायमूूर्ति वारले ने कहा कि

''यह न्यायालय जिला प्रशासन, स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ-साथ स्थानीय निकायों, जैसे औरंगाबाद नगर निगम, आदि द्वारा उठाए जा रहे व्यापक कदमों से अवगत है। यह न्यायालय ऐसी कठिन परिस्थितियों में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के माध्यम से समय पर दी जा रही सहायता की भी सराहना करता है,जबकि ऐसे समय में स्वयं के जीवन पर भी खतरा बना रहता है। ''

कोर्ट ने 31 मार्च, 2020 के एक आदेश में सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणियों का भी उल्लेख किया। जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था लाॅकडाउन के कारण बेरोजगार हुए मजदूरों को अपने जीवित रहने के बारे में आशंका थी क्योंकि कुछ फर्जी खबरों के कारण उनको घबराहट हो गई थी। इन खबरों में कहा गया था कि लाॅकडाउन तीन महीने से अधिक समय तक चलेगा।

पीठ ने इस मामले में अदालत की सहायता के लिए एडवोकेट अमोल जोशी को एमिकस क्यूरी या कोर्ट मित्र नियुक्त किया है। वहीं कलेक्टर, जिला औरंगाबाद और औरगांबाद के सरकारी मेडिकल कॉलेज व अस्पताल के डीन और औरंगाबाद नगर निगम के आयुक्त के माध्यम से महाराष्ट्र राज्य को नोटिस जारी किया है।




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