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बार को न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ निराधार आरोप लगाने वाले मुवक्किलों को हतोत्साहित करना चाहिए : मद्रास हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
17 Feb 2021 4:15 AM GMT
बार को न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ निराधार आरोप लगाने वाले मुवक्किलों को हतोत्साहित करना चाहिए : मद्रास हाईकोर्ट
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मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने हाल ही में कहा है कि वकीलों को चाहिए कि वे न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ निराधार आरोप लगाने से अपने मुवक्किलों को हतोत्साहित करें और इन आरोपों को अपनी दलीलों में शामिल करने से परहेज करें।

न्यायमूर्ति के. मुरली शंकर ने यह टिप्पणी उस पुनर्विचार याचिका पर की जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि याचिकाकर्ता को अपने मामले में व्यक्तिगत तौर पर पेश होकर विस्तार से जिरह करने का पर्याप्त मौका नहीं दिया गया था।

बेंच ने आगे टिप्पणी की,

"यह न्यायपालिका के हितधारकों के लिए उपयुक्त समय है कि वे न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ निराधार या लेश मात्र सत्य के बिना आरोप लगाने से परहेज करें।"

संक्षेप में मामला

याचिकाकर्ता के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक कानून, 1988 की धाराओं - 7, 12 और 13(1)(डी) के साथ पठित धारा 13(2) में शामिल अपराधों के तहत मुकदमा शुरू किया गया था और उसे ट्रायल का सामना करना पड़ा है।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया गया था कि ट्रायल कोर्ट ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 91 के तहत दायर याचिका उसे पूरी तरह सुने बिना खारिज कर दी थी एवं पुनर्विचार याचिका के आधार पर संबंधित आदेश को दरकिनार किये जाने की आवश्यकता है।

[ नोट : सीआरपीसी की धारा 91 के तहत प्रदत्त शक्तियां कोर्ट या किसी पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी को यह अधिकार प्रदान करने के लिए है कि वह सीआरपीसी के अंतर्गत जांच पड़ताल, ट्रायल या अन्य न्यायिक कार्यवाहियों के उद्देश्य से उस व्यक्ति को समन या लिखित आदेश जारी करके किसी दस्तावेज या अन्य चीजों की पेशी सुनिश्चित कराये, जिसके पास संबंधित सामग्री हो।]

हालांकि, याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट के समक्ष स्पष्ट किया कि वह संबंधित न्यायिक अधिकारी को न दोषी ठहरा रहा है, न ही कोई आरोप लगा रहा है। वकील ने कहा कि वह किसी प्रकार का दबाव नहीं बना रहा है।

इस पर कोर्ट ने कहा,

"वकील द्वारा कथित आरोप को त्वरित वापस लेना बहुत ही प्रशंसनीय है। लेकिन चूंकि आरोपों के ये बिंदु मुख्य याचिका में मौजूद हैं, इसलिए यह कोर्ट इस मामले की सुनवाई के लिए मजबूर है।"

महत्वपूर्ण रूप से, यह ध्यान देते हुए कि याचिकाकर्ता ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष कोई आपत्ति नहीं जतायी थी, कोर्ट ने टिप्पणी की,

"कोविड महामारी के दौरान, पूरा देश वर्चुअली काम कर रहा था। याचिकाकर्ता की यह शिकायत कि उसे व्यक्तिगत तौर पर पेश होकर अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया, सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुकदमों की वर्चुअल सुनवाई के आदेश और महामारी के दौरान इस कोर्ट द्वारा भी समय समय पर वर्चुअल सुनवाई के लिए जारी विभिन्न दिशानिर्देशों के खिलाफ है।"

अंत में, यह कहते हुए कि सीआरपीसी की धारा 91 का इस्तेमाल करने के लिए पार्टी को संबंधित दस्तावेज की प्रासंगिकता और आवश्यकता अथवा इच्छा प्रदर्शित करना बाध्यकारी है, कोर्ट ने कहा,

"यह स्थापित कानून है कि सीआरपीसी की धारा 91 अभियुक्त को कोई दस्तावेज मांगने के लिए कहने का सम्पूर्ण अधिकार प्रदान नहीं करती है और ऐसा तभी किया जाता है जब कोर्ट को तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर ऐसा लगता है कि ट्रायल, जांच या कार्यवाही के उद्देश्य से इन दस्तावेजों या सामग्रियों को पेश करना जरूरी है, इसके अलावा नहीं। इसलिए केवल यह देखा जाता है कि ट्रायल कोर्ट ने अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल विवेकपूर्ण और न्याय सम्मत किया है या नहीं?"

कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिका केवल मुकदमे को लंबा खींचने के लिए दायर की गयी थी। इसलिए कोर्ट को विशेष जज द्वारा जारी आदेश में कोई गड़बड़ी नजर नहीं आती है, और इस प्रकार, पुनर्विचार याचिका खारिज की जाती है।

केस का शीर्षक : ए. लक्ष्मणन बनाम राज्य सरकार

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