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(तब्लीगी जमात) विदेशियों ने पर्याप्त कष्ट उठाया, उन्हें जल्द से जल्द अपने देश लौटने का अधिकार: मद्रास हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
15 Jun 2020 3:52 PM GMT
(तब्लीगी जमात) विदेशियों ने पर्याप्त कष्ट उठाया, उन्हें जल्द से जल्द अपने देश लौटने का अधिकार: मद्रास हाईकोर्ट
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मद्रास हाईकोर्ट ने, एक महत्‍वपूर्ण निर्णय में, 31 विदेशी नागरिकों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही बंद करने का निर्देश दिया है। उन पर वीजा शर्तों का उल्लंघन कर दिल्ली में मार्च में हुई तब्लीगी जमात की बैठक में भाग लेने के आरोप में फॉरेनर्स एक्ट के तहत कार्यवाही हो रही थी।

कोर्ट ने कहा कि इन नागरिकों को जल्द से जल्द अपने मूल देश लौटने का अधिकार है। महामारी की स्थित‌ि में उन्हें लगातार कैद में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।

ज‌स्ट‌िस जीआर स्वामीनाथन की पीठ ने कहा, "चूंकि याचिकाकर्ताओं ने कानून के उल्लंघन के कारण पहले ही पर्याप्त रूप से कष्ट उठा लिया है, और चिकित्सा आपातकाल की स्थिति है, इसलिए याचिकाकर्ताओं को जल्द से जल्द अपने मूल देशों को लौटने का अधिकार है।"

कोर्ट ने कहा कि सशस्त्र संघर्ष या चिकित्सा आपातकाल की स्थिति में देश छोड़ने के अधिकार को लागू किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा, "सौभाग्य से याचिकाकर्ताओं को अब तक पॉजिट‌िव नहीं पाया गया है। कल स्थिति अलग हो सकती है। याचिकाकर्ताओं का जीवन खतरे में पड़ सकता है। समय अनिश्चित हो सकता है, हालांकि अधिकार निश्चित होना चाहिए। याचिकाकर्ता परिवहन की लागत वहन करने को तैयार हैं। वे अपने दूतावासों के साथ समन्वय करेंगे और वाणिज्य दूतावास उनकी वापसी की व्यवस्था करेंगे। उत्तरदाताओं को मात्र एक फेस‌‌िल‌िटेटर की भूमिका निभाने की आवश्यकता है।

ऐसा करने के बजाय, यदि उत्तरदाता याचिकाकर्ताओं को हिरासत में लेने और उन पर मुकदमा चलाने पर जोर देते हैं, तो इसे केवल अतार्किक, अनुचित और अन्यायपूर्ण माना जा सकता है। इसलिए, मेरा मानना ​​है कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाना निश्चित रूप से भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा और केवल उचित शर्तों पर उन्हें बंद करने का निर्देश देना ही न्याय के उद्देश्यों को पूरा करेगा।"

कोर्ट ने 11 बांग्लादेशी नागरिकों और 20 इंडोनेशियाई नागरिकों की जमानत याचिका पर विचार करते हुए निर्देश पारित किया।

आनुपातिक दृष्टिकोण लेने की जरूरत है

कोर्ट ने कहा कि या‌‌चिकाकर्ताओं की, टूर‌िस्ट वीजा का उल्लंघन कर, धार्मिक गतिविधियों में भागीदारी निश्चित रूप से फॉरेनर्स एक्ट के तहत अपराध है। कोर्ट ने यह भी कहा कि महामारी ‌‌की स्थिति में तब्लीगी जमात की बैठक के आयोजन के कारण सदस्यों के "लापरवाह और गैरजिम्मेदाराना" आचरण की गंभीर आलोचना हो चुकी है।

कोर्ट ने कहा कि मामले में आनुपातिकता के आधार पर एक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी "मनमाने ढंग से" याचिकाकर्ताओं के अपने मूल देश वापस लौटने के उनके अनुरोध को अस्वीकार नहीं कर सकते।

"चूंकि याचिकाकर्ता पहले ही सत्तर दिनों तक जेल में रह चुके हैं, इसलिए आनुपातिकता की समीक्षा की आवश्यकता है। मेरा विचार है कि उनकी जेल की अवधि को पर्याप्त सजा माना जाना चाहिए। जिन्हें याचिकाकर्ता पहले ही भुगत चुके हैं। याचिकाकर्ता अपने दुस्साहस की कीमत अदा कर चुके हैं, यह आग्रह करना कि कि उन्हें जेल की स्थिति में भारत में बने रहना चाहिए जब तक कि कार्यवाही संपन्न नहीं हो जाती है, आनुपातिकता और निष्पक्षता के सिद्धांत को समाप्त कर देती है।"

इस संबंध में, न्यायालय ने नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय करार (ICCPR) के अनुच्छेद 12 (4) का उल्लेख किया, जिसमें से भारत एक हस्ताक्षरकर्ता है - जो कहता है कि "किसी को भी अपने देश में प्रवेश करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाएगा।"

कोर्ट ने दी जमानत

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को अप्रैल, 2020 के पहले सप्ताह में गिरफ्तार किया गया था और जांच में कोई प्रगति नहीं हुई है। याचिकाकर्ताओं की निरंतर कैद किसी भी उद्देश्य की पूर्ति करने वाली नहीं है। चूंकि याचिकाकर्ता विदेशी हैं, इसलिए स्पष्ट रूप से उनके लिए स्थानीय जमानत की व्यवस्था करना मुश्किल होगा। इसलिए, न्यायालय ने निर्देश दिया कि वे खुद के बांड पर रिहा किए जाएंगे।

कोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत दिए जाने पर याचिकाकर्ताओं को ड‌िटेंशन कैंप में नहीं रखा जा सकता है। फॉरेनर्स एक्ट की धारा 4 (2) के अनुसार उन्हें "पर्यवेक्षण के तहत निर्धारित निवास के अलावा किसी स्थान पर निवास करना" चाहिए।

इसलिए, कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को केंद्रीय जेल, पुझाल के ट्रांजिट यार्ड में नहीं रखा जा सकता है, जैसा कि सरकार द्वारा प्रस्तावित है। इस संबंध में, अदालत ने याचिकाकर्ताओं के वकील द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव पर ध्यान दिया कि जामिया कास्मियाह अरबी कॉलेज, वाशरमेनपेट, चेन्नई का प्रबंधन याचिकाकर्ताओं को समायोजित करने के लिए तैयार है। कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को इस प्रस्ताव पर विचार करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने प्रोफेसर उपेंद्र बक्सी को उद्धृत करते हुए यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं को सामूहिक रूप से "तब्लीगी" कहने और दंडित करने बजाय, उनके व्यक्तिगत दुखों को भी देखना चा‌हिए।

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