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गुजरात हाईकोर्ट ने बिना मास्क के पकड़े गए लोगों को COVID-19 केंद्रों में सामुदाय‌िक सेवा करने का निर्देश दिया था, सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई

LiveLaw News Network
3 Dec 2020 10:15 AM GMT
गुजरात हाईकोर्ट ने बिना मास्क के पकड़े गए लोगों को COVID-19 केंद्रों में सामुदाय‌िक सेवा करने का निर्देश दिया था, सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को गुजरात हाईकोर्ट के एक आदेश पर रोक लगा दी, जिसके तहत बिना फेस कवर/मास्क के पकड़े गए लोगों को COVID-19 देखभाल केंद्रों में अनिवार्य रूप से सामुदाय‌िक सेवा के लिए भेजने की नीति बनाने या आदेश देने का गुजरात सरकार को निर्देश दिया गया था।

आदेश पर रोक लगाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुजरात हाईकोर्ट का निर्देश असंगत है, और इससे स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि कहा कि मास्क अनिवार्य हैं और उल्लंघन करने वालों को कानून के अनुसार दंडित किया जाना चाहिए।

गुजरात सरकार को अतिरिक्त मुख्य सचिव के माध्यम से यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देशित किया गया है कि भारत और गुजरात सरकार द्वारा मास्क पहनने के लिए जारी किए गए दिशा-निर्देशों को पुलिस अधिकारियों द्वारा राज्य में सख्ती से लागू किया जाए।

जस्टिस अशोक भूषण, आर सुभाष रेड्डी और एमआर शाह की खंडपीठ ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई की। सॉलिसिटर-जनरल तुषार मेहता ने याचिका की तत्काल सुनवाई का उल्लेख किया था।

आज की सुनवाई में, सॉलिसिटर जनलर ने कहा कि हालांकि मास्क नहीं पहनने की समस्या गंभीर है, लेकिन उन्हें COVID 19 देखभाल केंद्रों में में सेवा के लिए भेजना समाधान नहीं है।

मेहता ने कहा, "किसी व्यक्ति को COVID 19 देखभाल केंद्र में भेजने की तुलना में मास्क नहीं पहनने से हानि बहुत कम है। समस्या को युद्धस्तर पर हल किया जाना चाहिए।"

जस्टिस शाह ने दलील पर सहमति व्यक्त की और कहा कि इसे क्रियान्‍वित करना मुश्किल होगा - "जहां तक ​ क्रियान्वयन का संबंध है, इच्छाशक्ति की कमी है, और हाईकोर्ट ने इस पर ध्यान दिया है। केंद्र एसओपी बनाता है और दिशा-निर्देश देता है लेकिन उनके क्र‌ियान्वयन के बारे में क्या? लोग शादी समारोहों में जुट रहे हैं, मॉल में घूम रहे हैं!"

मेहता ने बेंच को बताया कि नागरिकों के पास सोशल डिस्टेसिंग और मास्क का विकल्प है और यह मानवता के लिए एकमात्र समाधान था।

उन्होंने कहा, "अनुशासनहीन होना, शायद हमारी संस्कृति में है, मास्क न पहनना आदि... आदर्श है।"

जस्टिस भूषण ने तुषार मेहता से गुजरात में मास्क नहीं पहनने के लिए लगाए गए जुर्माने के बारे में पूछा। उन्होंने पुलिस अधिकारी मास्क नहीं पहनने पर एक हजार रुपए जुर्माना लगा रहे हैं।

जस्टिस भूषण ने कहा, "जो लोग मास्क नहीं पहनते हैं, वे अन्य व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों का हनन कर रहे हैं। जो लोग एसओपी के अनुसार सभाएं आयोजित कर रहे हैं, उन्हें अधिकारियों को सूचित करना होगा? कौन जिम्मेदार है?"

एसजी ने जवाब दिया कि उपयुक्त अधिकारियों को सूचित करने की आवश्यकता है।

इस बिंदु पर, जस्टिस शाह ने कहा कि एक प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई थी, जिसमें कहा गया था कि कोई अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी। इस पर, एसजी ने जवाब दिया कि वह केंद्र और गुजरात की ओर से पेश हुए हैं, और दूसरे राज्यों को दोष देने की यह जगह नहीं है।

एसजी ने गुजरात हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने का अनुरोध किया और खंडपीठ को सूचित किया, "एक विशिष्ट अवलोकन कि यह किसी को भी मास्क पहनने से वंचित नहीं करता है और आदेश के उल्लंघन पर जुर्माना लगाया जा सकता है"।

उन्होंने कहा, "प्रत्येक राज्य के सचिव अनिवार्य करने दीजिए कि वे किस प्रकार सामाजिक दूरी के आदेश को लागू करेंगे।"

इस नोट पर, सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए कि भारत सरकार द्वारा गुजरात हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी, पर रोक लगा दी।

2 दिसंबर को चीफ जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जेबी पारदीवाला की खंडपीठ ने बिना फेस कवर/मास्क के पकड़े गए लोगों को COVID-19 देखभाल केंद्रों में अनिवार्य रूप से सामुदाय‌िक सेवा के लिए भेजने की नीति बनाने या आदेश देने का गुजरात सरकार को निर्देश दिया गया था।

बेंच ने उक्त निर्देश राज्य सरकार द्वार यह कहने के बाद जारी किया कि, वह फेस कवर / मास्क नहीं पहनने वालों या सोशल डिस्टेंसिंग मानदंडों का उल्लंघन करने वालों को COVID 19 केंद्रों में सामुदायिक सेवा करने के लिए भेजने की इच्छुक नहीं है।

खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा था, "यह देखते हुए कि राज्य को ऐसे समय में सबसे सक्रिय तरीके से कार्य करने की आवश्यकता है, राज्य का रुख दुर्भाग्यपूर्ण है।"

य‌ाचिका डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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