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सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले समाज के कमजोर वर्ग के छात्रों को प्राइवेट स्कूल के छात्रों के समान गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान की जानी चाहिएः मद्रास हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
11 Jun 2021 10:45 AM GMT
सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले समाज के कमजोर वर्ग के छात्रों को प्राइवेट स्कूल के छात्रों के समान गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान की जानी चाहिएः मद्रास हाईकोर्ट
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मद्रास हाईकोर्ट ने मंगलवार को सरकारी स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर चिंता व्यक्त की और कहा कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले वंचित वर्गों के छात्रों और ग्रामीण छात्रों को निजी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों के समान गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए।

न्यायमूर्ति एन. किरुबकरण और न्यायमूर्ति टी. वी. थमिलसेल्वी की पीठ सरकारी प्राथमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापक के रूप में पदोन्नत होने के लिए सेवा शर्तों के संबंध में दायर एक रिट अपील पर सुनवाई कर रही थी।

न्यायालय ने कहा कि यद्यपि तमिलनाडु उच्च शिक्षा का केंद्र है, उसके बावजूद भी विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों और सरकारी स्कूलों में स्कूली शिक्षा का स्तर घटिया बताया गया है।

लेकिन, कोर्ट ने कहा कि चूंकि मामला प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापकों से संबंधित है, इसलिए उन स्कूली छात्रों की स्थिति पर गौर करना उचित है जो सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में।

कोर्ट ने कहा, ''सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचे की कमी और सरकारी स्कूलों में छात्रों को दी जाने वाली शिक्षा की खराब गुणवत्ता ही सरकारी स्कूलों में छात्रों के कम प्रवेश का कारण है।''

सरकारी स्कूल के शिक्षकों से संबंधित मुद्दे

अदालत ने कहा कि भले ही सरकारी स्कूल के शिक्षकों को निजी स्कूल के शिक्षकों की तुलना (जिन्हें बहुत कम वेतन और अधिक घंटे काम करना होता है) में अच्छा वेतन दिया जाता है, लेकिन सरकारी स्कूल के छात्रों को दी जा रही शिक्षा की तुलना निजी स्कूल के छात्रों से नहीं की जा सकती है।

महत्वपूर्ण रूप से, कोर्ट ने कहा किः

''निजी स्कूलों में प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों और शौचालयों सहित बुनियादी ढांचे को ठीक से उपलब्ध कराया गया है। शिक्षा की खराब गुणवत्ता के कारण सरकारी स्कूल के छात्रों को मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश नहीं मिल पाता है और सरकार को मेडिकल एडमीशन के लिए सरकारी स्कूल के छात्रों के लिए 7.5 प्रतिशत विशेष आरक्षण प्रदान करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।''

कोर्ट ने कहा कि इस न्यायालय के समक्ष कई मामले सामने आए हैं, जो उन सरकारी स्कूल के शिक्षक से संबंधित थे, जो एक साथ कई दिनों तक स्कूल नहीं गए थे, जिससे छात्रों की शिक्षा प्रभावित हुई।

कोर्ट ने कहा, ''हालांकि बहुत सारे ऐसे प्रतिबद्ध शिक्षक हैं,जो ईमानदारी से सरकारी स्कूलों में शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। ऐसे शिक्षकों की सराहना की जानी चाहिए। लेकिन ऐसे शिक्षकों की संख्या बढ़ रही है, जो शिक्षण के लिए प्रतिबद्ध नहीं हैं।''

न्यायालय का यह भी विचार था कि ग्रामीण क्षेत्रों के शिक्षकों में छात्रों को शिक्षा प्रदान करने के लिए उत्साह की कमी है क्योंकि कई शिक्षक विभिन्न अन्य निजी व्यवसायों में शामिल हैं और उन पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

कोर्ट का आदेश

कोर्ट ने आवश्यक बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराकर, स्कूल स्तर पर योग्य शिक्षकों की नियुक्ति करके और शिक्षकों पर निरंतर निगरानी रखकर शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए तत्काल कदम उठाने को कहा है ताकि छात्रों को सही तरीके से शिक्षा दी जा सके।

उपरोक्त स्थिति को देखते हुए, न्यायालय ने आशा व्यक्त की है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा की खराब गुणवत्ता के कारणों की जांच करने और सुधारात्मक उपायों का सुझाव देने के लिए विशेषज्ञों और शिक्षाविदों की एक समिति का गठन किया जाएगा या सरकारी स्कूलों में स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए सरकार स्वयं कोई अन्य सुधारात्मक उपाय करे।

इसलिए, कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह उद्योगों को एक या दो सरकारी स्कूलों को अपनाने के लिए कहे ताकि बुनियादी ढांचे और शिक्षा के स्तर में सुधार हो सके।

अंत में, राज्य सरकार के वकील को अदालत द्वारा सुझाए गए समिति के गठन या सरकारी स्कूलों में स्कूली शिक्षा को प्रभावित करने वाले कारकों (विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में) को देखने के लिए सरकार द्वारा स्वयं किए गए किसी भी अन्य उपायों के संबंध में एक स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। इसके साथ ही शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए उचित उपाय सुझाए जाएं और यह भी बताया जाए कि इस न्यायालय की मदुरै पीठ द्वारा पारित आदेश के कार्यान्वयन के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं,जिसके तहत हर स्कूल में शौचालय का प्रावधान करने और परिसर की दीवारों का निर्माण करने के लिए कहा गया था।

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