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राज्य को समाज के कमजोर वर्गों में भोजन वितरित करने से स्वैच्छिक संगठनों को नहीं रोकना चाहिए : कर्नाटक हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
15 April 2020 4:15 AM GMT
राज्य को समाज के कमजोर वर्गों में भोजन वितरित करने से स्वैच्छिक संगठनों को नहीं रोकना चाहिए : कर्नाटक हाईकोर्ट
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कर्नाटक हाईकोर्ट ने सोमवार को राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह स्वैच्छिक संगठनों को समाज के कमजोर वर्गों में भोजन वितरित करने से न रोके।

मुख्य न्यायाधीश अभय ओका और न्यायमूर्ति बी. वी.नागरथना की खंडपीठ ने नो योर राइट्स एसोसिएशन की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई की, जिसमें कालाबुरागी जिला प्रशासन द्वारा जारी एक आदेश का मामला उठाया गया था।

इस आदेश में कहा गया है कि जो संगठन भिखारियों, जरूरतमंदों और बेघरों को भोजन वितरित कर रहे हैं, वे आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 144 के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश का सीधा उल्लंघन कर रहे हैं। ऐसी ही स्थिति धारवाड़ जिले में भी बताई गई है।

पीठ ने कहा कि

'' प्रथम दृष्टया हमारा मानना है कि तब तक स्वैच्छिक संगठनों को समाज के कमजोर वर्गों में भोजन वितरित करने से नहीं रोका जा सकता है जब तक कि वे सामाजिक दूरी के मानदंडों का पालन कर रहे हैं और अन्य एहतियाती कदम उठा रहे हैं।''

अदालत ने एक बार फिर से सरकार को सुझाव दिया है कि वह जमीनी स्तर पर काम करने वाली एनजीओ के साथ समन्वय बनाए। पीठ ने कहा कि ''हम अपने पहले आदेश से ही राज्य सरकार को सुझाव दे रहे हैं कि क्षेत्र में काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों की गतिविधियों को समन्वित करने की आवश्यकता है।

यदि राज्य सरकार एक ऐसा पोर्टल बनाने में असमर्थ है जहां पर सभी एनजीओ अपनी जानकारी अपलोड कर सकती हैं, तो राज्य को गैर-सरकारी संगठनों की गतिविधियों को समन्वित करने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जिला स्तर, नगरपालिका स्तर आदि पर बैठकें करने पर विचार करना चाहिए। यह उचित होगा कि ऐसी बैठकों में जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) के अध्यक्षों और सचिवों को भी उपस्थित होने के लिए आमंत्रित किया जाए। "

प्रवासियों और बेघर लोगों की मदद के लिए बीबीएमपी द्वारा किए गए प्रयास संतोषजनक नहीं हैं।

अपने नौ अप्रैल के आदेश में कर्नाटक हाईकोर्ट ने ब्रुहट बेंगलुरु महानगर पालिका (बीबीएमपी) को कड़ी फटकार लगाई थी क्योंकि बीबीएमपी ने यह पता लगाने के लिए कोई व्यवस्थित प्रयास नहीं किया था कि बेंगलुरु शहर में कितने प्रवासी, बेघर और फंसे हुए या असहाय लोग सड़कों पर रह रहे हैं या फ्लाईओवर के नीचे जैसी सार्वजनिक जगहों पर रहने को मजबूर हैं। अदालत ने शहरी विकास विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को निर्देश दिया था कि वह बीबीएमपी को उचित निर्देश जारी करें ताकि यह सुनिश्चित किया जा सकें कि राज्य सरकार द्वारा किए गए सभी उपाय बीबीएमपी की सीमा के भीतर कार्यान्वित हो पाएं।

राज्य ने अदालत को बताया किया कि उसने 11 अप्रैल को एक परिपत्र या सर्कुलर जारी किया है। जो प्रवासियों, बेघर व्यक्तियों, असहाय और उन लोगों के लिए आश्रय गृह खोलने के संबंध में है, जो COVID-19 लॉकडाउन के कारण सड़कों पर फंसे हुए हैं।

अदालत ने कहा कि ''बीबीएमपी द्वारा दायर दूसरी रिपोर्ट को देखने के बाद पाया गया है कि यह भी संतोषजनक नहीं है। 11 अप्रैल, 2020 को जारी परिपत्र में जो निर्देश दिए गए थे उनके अनुपालन के संबंध में इस रिपोर्ट में कुछ नहीं बताया गया है। इस तथ्य को ध्यान में रखा जाना जरूरी है कि राज्य में पाए गए COVID-19 के पाॅजिटिव मामलों में से एक तिहाई मामले बेंगलुरु शहरी जिले से हैं। इसलिए राज्य सरकार द्वारा जारी निर्देशों का बीबीएमपी द्वारा अनुपालन अत्यंत महत्वपूर्ण है।''

पीठ ने बीबीएमपी को सुझाव दिया कि वह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई के समय अदालत के समक्ष पेश होने वाले बार के सदस्यों के साथ मंगलवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए एक बैठक करें। वहीं बीबीएमपी को 15 अप्रैल तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने के लिए कहा गया है।

पीठ ने 7 अप्रैल को बीबीएमपी को निर्देश दिया था कि वह प्रवासी श्रमिकों के लिए आश्रय गृह स्थापित करने के लिए तत्काल कदम उठाएं। साथ ही कहा था कि यह सुनिश्चित किया जाए कि इनको सभी सुविधाएं मिल सकें। पीठ के समक्ष कर्नाटक राज्य कानूनी सहायता सेवा प्राधिकरण (केएसएलएसए) की तरफ से पेश वकील ने दलील दी थी कि बेंगलुरु शहर में प्रवासी श्रमिकों की स्थिति परेशान करने वाली है। जिसके बाद पीठ ने उपरोक्त निर्देश दिए थे। पता चला था कि 2000 से अधिक लोग मजेस्टिक रेलवे स्टेशन और बलपेट सर्कल के आसपास एकत्रित हो गए थे।

धार्मिक मण्डली पर प्रतिबंध लगाने के लिए डीजीपी ने जारी किया सर्कुलर

राज्य सरकार ने अदालत को सूचित किया कि 10 अप्रैल को पुलिस महानिदेशक और पुलिस महानिरीक्षक ने सभी धार्मिक मण्डली पर पूर्ण प्रतिबंध का कड़ाई से पालन करवाने के लिए एक परिपत्र जारी किया है।

पैरा-लीगल वालंटियर्स को दिया संरक्षण

कर्नाटक राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण (केएसएलएसए) की तरफ से पेश वकील ने अदालत को बताया किया कि डीएलएसए से जुड़े पैरा-लीगल स्वयंसेवकों (पीएलवी) को संबंधित डीएसएलए के सचिवों द्वारा पास जारी किए जा रहे हैं।

हालांकि, पुलिस ऐसे पास के आधार पर पीएलवी को इधर-उधर जाने की अनुमति नहीं दे रही है। बेंगलुरु शहर में कई स्थानों पर पुलिस अधिकारी डीएलएसए के अस्तित्व के बारे में अज्ञानता दिखा रहे हैं। कई ऐसे मामले सामने आए हैं,जब पीएलवी के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया है।

पीठ ने कहा "रिकॉर्ड (केएसएलएसए द्वारा) पर रखी गई रिपोर्ट बताती है कि राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और डीएलएसए पूरे राज्य में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

इसलिए हम यह निर्देश देते हैं कि डीएलएसए के अध्यक्षों द्वारा किए गए अनुरोध पर राज्य के संबंधित अधिकारी अपेक्षित संख्या में पास जारी करें ताकि पीएलवी अपने उन कर्तव्यों को पूरा करने में सक्षम बन सकें जो उन्हें सौंपे गए हैं।''

अदालत ने पुलिस महानिदेशक को भी यह सुझाव दिया है कि वह आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने पर विचार करें ताकि पुलिस अधिकारी डीएलएसए द्वारा जारी प्रमाण पत्र/पास पेश करने के बाद पीएलवी को उनका काम करने की अनुमति दे सकें।

पीठ ने कहा कि

''राज्य सरकार पास के धारक के नाम के काॅलम को खाली रखकर पास की आपूर्ति डीएसएलए को कर सकती है। जिसके बाद डीएलएसए के सचिव उस पास में धारक का नाम खुद भर देंगे। साथ ही यह स्पष्ट कर दिया जाएगा कि पास गैर-हस्तांतरणीय होगा और शाम के समय पीएलवी इस पास को संबंधित डीएलएसए को वापिस कर देंगे।''

विभिन्न स्थानों पर लगातार आने-जाने वाले पीएलवी और डीएलएसए के सचिवों के लिए मास्क और हाथ के दस्ताने उपलब्ध न होने का मामला भी उठाया गया। अदालत ने डीएलएसए को निर्देश दिया है कि वह संबंधित जिला स्वास्थ्य अधिकारी के पास पर्याप्त संख्या में मास्क और हाथ के दस्ताने उपलब्ध कराने के लिए एक अनुरोध करें। ताकि पीएलवी और न्यायिक अधिकारी साइट विजिट के दौरान इनका उपयोग कर पाएं। पीठ ने कहा कि-''हम आशा और विश्वास करते हैं कि राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में जल्द से जल्द अपेक्षित कार्रवाई की जाएगी।''




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