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पार्टनर के चयन पर किसी व्यक्ति के निर्णय में राज्य या समाज दखल नहीं दे सकताः कर्नाटक हाईकोर्ट

Manisha Khatri
15 Jun 2022 1:54 PM GMT
पार्टनर के चयन पर किसी व्यक्ति के निर्णय में राज्य या समाज दखल नहीं दे सकताः कर्नाटक हाईकोर्ट
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कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि वैवाहिक बंधन के लिए एक पार्टनर या जीवनसाथी की उपयुक्तता का निर्णय विशेष रूप से स्वयं व्यक्तियों के पास होता है। उनके इस क्षेत्र में न तो राज्य और न ही समाज दखल दे सकता है।

जस्टिस बी वीरप्पा और जस्टिस के.एस. हेमलेखा की खंडपीठ ने एक 19 वर्षीय लड़की (जिसके बारे में बताया गया कि वह माता-पिता को बताए बिना भाग गई और उसने शादी कर ली) के पिता द्वारा दायर एक हैबियस कार्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका को खारिज करते हुए कहा,

''न्यायालयों को, संवैधानिक स्वतंत्रता के समर्थक के रूप में, उनकी स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए। न्यायालयों का कर्तव्य है कि वे एक राष्ट्र के रूप में हमारे बहुलवाद और विविधता को बनाए रखने के मार्ग को न बदलें।''

यह भी कहा कि, ''मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, यह न्यायालय याचिकाकर्ता की बेटी को प्रतिवादी नंबर दो के साथ रहने की अनुमति देना उचित समझता है। चूंकि यह न्यायालय आश्वस्त है कि याचिकाकर्ता की बेटी किसी की भी अवैध कस्टडी में नहीं है,इसलिए वर्तमान रिट याचिका (एचसी) खारिज किए जाने योग्य है।''

हालांकि, मामले के तथ्यों को देखने और कोर्ट में उपस्थित याचिकाकर्ता की बेटी और उसके पति से पूछताछ करने के बाद पीठ ने कहा, ''यह कहना भी प्रासंगिक है कि माता-पिता को भी यह समझना चाहिए कि उनके बच्चे राष्ट्र की सर्वाेच्च संपत्ति हैं। कौशल विकास, मनोरंजन और सांस्कृतिक गतिविधियों को शामिल करने वाली उचित शिक्षा का बच्चे पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।''

कोर्ट ने आगे कहा,

''हमारे इतिहास से पता चलता है कि ऐसे माता-पिता हैं जिन्होंने बच्चों के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया था और ऐसे बच्चे भी थे जिन्होंने माता-पिता के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया था। यह केवल दोनों यानि माता-पिता और बच्चों के बीच का आपसी प्यार और स्नेह है। अगर दोनों के बीच प्यार और स्नेह है तो परिवार में कोई दरार नहीं हो सकती और न ही बच्चों का अपने माता-पिता के खिलाफ जाने का सवाल पैदा होगा या ना ही माता-पिता को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए बच्चों के खिलाफ अदालत में जाना पड़ेगा। माता-पिता को बच्चों के आत्मविश्वास को पुनः प्राप्त करने के लिए अपने प्यार व स्नेह से परिवार में एक अच्छा माहौल बनाना चाहिए। बच्चों को यह भी समझना चाहिए कि उनके माता-पिता के बिना, वे पृथ्वी पर नहीं आ पाते और नौकरी, धन और अन्य विलासिता सहित शैक्षिक संभावनाओं का आनंद नहीं ले पाते और यह सब उनको केवल उनके माता-पिता के योगदान से ही मिला है।''

अपने माता-पिता को बताए बिना लड़की के भाग जाने के लिए उसे फटकार लगाते हुए, पीठ ने कहा, ''वह अपना भविष्य तय करने और अपना साथी चुनने के लिए स्वतंत्र है और साथ ही, उसे उस पीड़ा व दर्द का कारण नहीं बनना चाहिए,जो उसके माता-पिता को पहुंची है। प्रतिवादी नंबर 2 के साथ भागने के बजाय उसे पूरी निष्पक्षता के साथ अपनी पढ़ाई के बारे में सोचना चाहिए था और प्रतिवादी नंबर 2 के साथ अपने प्यार के बारे में अपने माता-पिता को सूचित करना चाहिए था। वहीं प्रतिवादी नंबर 2 के साथ विवाह करने के लिए अपने माता-पिता को समझाने की कोशिश करनी चाहिए थी।''

कोर्ट ने कहा कि,''वर्तमान मामले के अजीबोगरीब तथ्य और परिस्थितियां स्पष्ट रूप से दर्शा रही हैं कि प्यार अंधा होता है और माता-पिता, परिवार के सदस्यों और समाज के प्यार और स्नेह से अधिक शक्तिशाली हथियार है।''

बेंच ने लड़की द्वारा उठाए गए कदमों से असहमति जताते हुए कहा, ''बच्चों के लिए यह जानने का समय आ गया है कि जीवन में प्रतिक्रिया, प्रतिध्वनि और प्रतिबिंब शामिल होते हैं। वे आज अपने माता-पिता के साथ जो कर रहे हैं, कल उनको ठीक वैसा ही मिलेगा। उनकी शिक्षा, शक्ति-स्थिति और धन का क्या उपयोग, जब यह उन्हें अपना भाग्य बदलने में मदद नहीं कर सकता है। जब उनके मन में बुरे विचार आते हैं, तो उनकी शिक्षा, बुद्धि, शक्ति और धन व्यर्थ और अर्थहीन हो जाते हैं।''

यह भी कहा, ''माता-पिता से बड़ा कोई भगवान नहीं है। करुणा से बड़ा कोई धर्म नहीं है, क्रोध से बड़ा कोई शत्रु नहीं है, अच्छी प्रतिष्ठा से बड़ा कोई धन नहीं है, बदनामी ही मृत्यु है। मनुस्मृति के अनुसार भी, कोई भी व्यक्ति अपने माता-पिता को 100 साल में भी उन सभी परेशानियों का भुगतान नहीं कर सकता हैं, जो उन्होंने उसको जन्म देने से लेकर उसे वयस्कता तक लाने में उठाई हैं। इसलिए, हमेशा वो करने की कोशिश करें तो उनके माता-पिता और उनके शिक्षक को अच्छा लगता है, क्योंकि तभी तुम्हारे द्वारा की गई कोई भी धार्मिक उपासाना फल देगी।''

बहरहाल, यह देखते हुए कि किसी व्यक्ति से शादी करने का अधिकार अपनी पसंद है,जो संविधान के आर्टिकल 21 का अभिन्न अंग है, पीठ ने कहा, ''पोशाक और भोजन के मामले, विचारों और विचारधाराओं के, प्रेम और साझेदारी के मामले पहचान के केंद्रीय पहलुओं के दायरे में आते हैं। कानून एक वैध विवाह की शर्तों को विनियमित (संवैधानिक अनुपालन के अधीन) कर सकता है, क्योंकि यह उन स्थितियों को नियंत्रित कर सकता है जिनमें वैवाहिक बंधन समाप्त या निरस्त किया जा सकता है। ये उपाय विवाह के पक्षकारों के लिए उपलब्ध हैं क्योंकि वे ही सबसे अच्छा निर्णय लेते हैं कि क्या उन्हें एक-दूसरे को वैवाहिक बंधन में स्वीकार करना चाहिए या उस रिश्ते में बने रहना चाहिए? जीवनसाथी के लिए उनकी पसंद का निर्धारण करने में माता-पिता सहित समाज की कोई भूमिका नहीं है।''

अंत में, माता-पिता या उनके परिवार के सदस्यों को उनकी बेटी के जीवन में हस्तक्षेप नहीं करने का निर्देश देते हुए, पीठ ने कहा,''प्यार ''दिल से दिल तक होना चाहिए और सिर्फ बाहरी आकर्षण नहीं''। यह प्रकृति का निर्णय है किसी और का नहीं और माता-पिता को प्रकृति का निर्णय स्वीकार करना चाहिए और प्रकृति के खिलाफ नहीं जाना चाहिए।''

कोर्ट ने इस कपल को एक महीने के भीतर संबंधित सब-रजिस्ट्रार के कार्यालय में उनकी शादी का पंजीकरण कराने का भी निर्देश दिया है।

केस टाइटल- टी.एल. नागराजू बनाम पुलिस निरीक्षक,

केस नंबर- रिट याचिका (एचसी) नंबर 42/2022

साइटेशन- 2022 लाइव लॉ (केएआर) 211

आदेश की तिथि- 25 मई, 2022

प्रतिनिधित्व- याचिकाकर्ता के लिए सीनियर एडवोकेट सतीश एम. डोड्डमनी, एडवोकेट सागर बी.बी पेश हुए और प्रतिवादी के लिए एचसीजीपी, रोहित बी.जे पेश हुए।

आदेश पढ़ने/डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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