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"ऑनलाइन क्लास के लिए ट्यूशन फ़ीस लेकर स्कूल कुछ गलत नहीं कर रहे", दिल्ली हाईकोर्ट डीओई के आदेश में दख़ल देने से इंकार किया

LiveLaw News Network
30 April 2020 2:45 AM GMT
ऑनलाइन क्लास के लिए ट्यूशन फ़ीस लेकर स्कूल कुछ गलत नहीं कर रहे,  दिल्ली हाईकोर्ट डीओई के आदेश में दख़ल देने से इंकार किया
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दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि वह शिक्षा निदेशालय को यह आदेश नहीं दे सकता कि वह स्कूलों को लॉकडाउन के दौरान ट्यूशन फ़ीस नहीं लेने का निर्देश दे।

रजत वत्स बनाम जीएनसीटीडी मामले में इस अदालत के फ़ैसले का संदर्भ देते हुए न्यायमूर्ति डीएन पटेल और न्यायमूर्ति हरि शंकर की खंडपीठ ने कहा कि फ़ीस लेना उचित है क्योंकि स्कूल ऑनलाइन क्लास का आयोजन कर रहे हैं, स्टडी मटेरियल दे रहे हैं और अपने स्टाफ़ को वेतन दे रहे हैं।

यह आदेश नरेश कुमार की याचिका पर दिया गया है जिसमें उन्होंने मांग की थी कि अदालत देशव्यापी लॉकडाउन के कारण स्कूलों को इस अवधि में ट्यूशन फ़ीस लेने से रोकने का आदेश जारी करें।

याचिका में दलील दी गई कि लॉकडाउन के कारण पेरेंट्स को स्कूल का फ़ीस चुकाने में भी भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। फिर दिल्ली स्कूल शिक्षा नियम के नियम 165 में कहा गया है कि स्कूल अपने परिसर में लॉकडाउन के दौरान फ़ीस नहीं वसूलेंगे।

अदालत ने 17 अप्रैल को जारी शिक्षा निदेशालय की अधिसूचना पर ग़ौर किया जिसमें कहा गया था कि स्कूलों को लॉकडाउन के दौरान ट्यूशन फ़ीस के अलावा कोई और फ़ीस वसूलने से मना किया गया है।

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को यह याचिका दायर करने का अधिकार नहीं है क्योंकि वह इससे निजी तौर पर प्रभावित नहीं है और न ही उसने किसी प्रभावित पेरेंट को इस याचिका का हिस्सा बनाया है।

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने नियम 165 का जो उल्लेख किया है उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस नियम में फ़ीस देने की योग्यता की बात की गई है न कि फ़ीस वसूलने की। अदालत ने यह भी कहा कि लॉकडाउन के दौरान स्कूल ट्यूशन फ़ीस नहीं वसूल सकता यह इस नियम का हिस्सा नहीं है।

अदालत ने कहा,

"यह आदेश छात्रों को स्कूल को ट्यूशन फ़ीस चुकाने की ज़रूरत से बचाता नहीं है, क्योंकि ट्यूशन फ़ीस से ही वेतन, प्रतिष्ठान का खर्च पढ़ाई संबंधी गतिविधि का खर्च चलाया जाता है और लॉकडाउन के दौरान यह सब खर्च जारी रहेगा और तब तक रहेगा जब तक स्कूल दोबारा सामान्य ढंग से काम नहीं शुरू कर देता है। पैसे पेड़ पर नहीं लगते और जिन स्कूलों को सरकारी मदद नहीं मिलती, जिन्हें सरकार से फंड नहीं प्राप्त होता वे पूरी तरह फ़ीस पर ही अपने सभी ख़र्चों के लिए निर्भर होते हैं।"

पेरेंट्स पर बोझ की जहां तक बात है, अदालत ने कहा कि शिक्षा निदेशालय के आदेश में इस बात का पर्याप्त रूप से ध्यान रखा गया है और स्कूलों से कहा गया है कि वे उन छात्रों को भी स्टडी मटेरियल उपलब्ध कराएं जो वित्तीय मुश्किलों की वजह से फ़ीस नहीं चुका पाते हैं। और यह आदेश स्कूलों को फ़ीस चुकाने के लिए ऐसे पेरेंट्स पर दबाव डालने से रोकता है।

अदालत ने कहा कि इन बातों को देखते हुए उसे शिक्षा निदेशालय के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नज़र नहीं आता।

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