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सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को दिया निर्देश, COVID19 टेस्ट का परिणाम सीधे मरीज और उसके रिश्तेदारों को दिया जाए

LiveLaw News Network
20 Jun 2020 4:15 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने  महाराष्ट्र सरकार को दिया निर्देश, COVID19 टेस्ट का परिणाम सीधे मरीज और उसके रिश्तेदारों को दिया जाए
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महाराष्ट्र सरकार द्वारा जारी एक सर्कुलर को दरकिनार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि COVID19 टेस्ट का परिणाम सीधे तौर पर मरीज और उसके रिश्तेदारों को दिया जाए।

जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने कहा है कि राज्य सरकार द्वारा लगाए गए इस तरह के प्रतिबंध को खत्म किया जाना चाहिए।

महाराष्ट्र राज्य की तरफ से पेश वकील ने कहा कि वह महाराष्ट्र सरकार को इस सर्कुलर की समीक्षा करने की सलाह देंगे।

पीठ ने यह भी कहा है कि दिल्ली के साथ-साथ अन्य राज्यों में चल रहे मामलों के बारे में एक स्टेटस रिपोर्ट हर हफ्ते कोर्ट में दायर की जानी चाहिए। वहीं इन मुद्दों पर गौर करने के लिए केंद्र ओर राज्य के डाॅक्टरों को शामिल करके एक विशेषज्ञ समिति गठित की जानी चाहिए ताकि समय-समय पर उपचारात्मक (यदि किसी भी) कार्रवाई की जा सकें।

न्यायालय ने एएसजी संजय जैन (एनसीटी दिल्ली सरकार के लिए पेश हुए) की तरफ से दी गई उन दलीलों पर भी ध्यान दिया कि अब राज्य में डॉक्टरों के खिलाफ कोई प्राथमिकी लंबित नहीं है।

जैन ने कहा, ''डॉक्टर के खिलाफ की गई कार्रवाई को वापस ले लिया गया है।''

न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि,'

'अस्पतालों के खिलाफ भी कोई एफआईआर लंबित नहीं होनी चाहिए।''

पिछली सुनवाई पर कोर्ट ने शिकायत करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के मामले में जीएनसीटीडी की खिंचाई की थी।

इसके अलावा, अदालत ने कहा था कि नई दिल्ली स्थित एलएनजेपी अस्पताल की तरफ से दलील दी गई थी कि अस्पतालों के सभी वार्डों में कैमरे लगाए जाएंगे। न्यायमूर्ति भूषण ने कहा कि ''सभी राज्यों के अस्पतालों को ऐसा करने के लिए निर्देश दिया जाएगा।''

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि

"केंद्र को COVID टेस्टिंग दरों के मामले में सभी राज्यों के लिए एक यूनिफाॅर्म एडवाइजरी जारी करनी चाहिए।''

इसके मामले में पीठ ने विभिन्न हस्तक्षेप आवेदनों पर भी विचार किया लेकिन उनके आधार पर कोई विशिष्ट आदेश पारित नहीं किया। कोर्ट ने सभी हस्तक्षेपकर्ताओं से कहा है कि वह सॉलिसिटर जनरल के साथ-साथ अपने-अपने राज्य के वकीलों को अपने विशेष सुझाव लिखित रूप में दे दें ताकि वह उन पर विचार कर सकें।

न्यायमूर्ति कौल ने एक हस्तक्षेपकर्ता श्री उदयन शर्मा (अस्पताल के अधिकारियों की कथित घोर लापरवाही के कारण उनके दादा का निधन हो गया था ) से कहा कि-

''हम उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बारे में जानते हैं जिससे आपके दादाजी को गुजरना पड़ा था। यह दिल्ली में मामलों की खेदजनक स्थिति को दर्शाता है। इसलिए अपने सुझाव एसजी को दे दें।''

कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार के उस सर्कुलर पर भी संज्ञान लिया है,जिसमें कहा गया था कि कोरोनावायरस टेस्ट की रिपोर्ट मरीजों और /या उनके रिश्तेदारों को नहीं दी जाएगी। अदालत ने कहा कि इसे खत्म किया जाना चाहिए। पीठ ने यह भी कहा कि उपरोक्त निर्देश आज ही एससी की वेबसाइट पर विस्तार में में उपलब्ध होंगे।

मामले की पृष्ठभूमि

17 जून को, कोर्ट ने दिल्ली सरकार द्वारा डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों को निशाना बनाने के मामले में फटकार लगाई थी। कोर्ट एक स्वत संज्ञान मामले की सुनवाई कर रही है। जिसका शीर्षक है-'' In Re प्राॅपर ट्रीटमेंट ऑफ COVID19 पेशेंट्स एंड डिग्निफाइड हैंडलिंग ऑफ डेड बाॅडीज इन दाॅ हाॅस्पिटल''

यह देखते हुए कि कोरोना रोगियों की देखभाल के मामले में दिल्ली सरकार का जवाब अस्पष्ट और अपूर्ण था, कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया था कि कोरोनावायरस संकट के प्रबंधन के मामले में अपना जवाब ठीक से देते हुए एक ''बेहतर हलफनामा''दायर करें।

दिल्ली सरकार के लापरवाह पूर्ण रवैये पर कटाक्ष करते हुए, पीठ ने एएसजी संजय जैन (दिल्ली सरकार के वकील) को कहा था कि सरकार मामलों की संख्याओं को दबा रही है और डॉक्टरों को एफआईआर दर्ज करने की धमकी दे रही है।

पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि-

''डॉक्टर और नर्स हमारे सैनिक हैं। हम एक युद्ध लड़ रहे हैं। अगर हम उनके साथ सही व्यवहार नहीं करेंगे तो आप युद्ध कैसे जीतेंगे? लेकिन आपका दृष्टिकोण ऐसा ही लग रहा है और आप डॉक्टरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर रहे हैं। आप मैसेंजर के जरिए पैरामेडिक्स व डॉक्टरों को निशाना बना रहे हैं! आप संख्याओं को दबा रहे हैं और डॉक्टरों को धमकी दे रहे हैं।''

इसके अलावा, पीठ ने यह भी कहा था कि हेल्थ केयर कर्मियों के खिलाफ दिल्ली सरकार द्वारा उठाए गए सभी दुर्भाग्यपूर्ण कार्रवाई को वापस लिया जाए।

11 जून को पीठ ने COVID19 स्थिति के प्रबंधन को लेकर दिल्ली, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात और तमिलनाडु की सरकारों को नोटिस जारी किया था। साथ ही इन सभी राज्य सरकारों से अस्पतालों में मरीजों की देखभाल और शवों को संभालने के प्रबंधन के बारे में जवाब मांगा था।

शीर्ष अदालत ने लोक नायक जय प्रकाश अस्पताल, नई दिल्ली को भी नोटिस जारी किया था, जहां से COVID19 रोगियों के शवों का ठीक से प्रबंध न करने के संबंध में चैंकाने वाले दृश्य सामने आए थे।

इसके अलावा, पीठ ने दिल्ली में परीक्षण दरों की खराब स्थिति और असहाय रोगियों के भयानक दृश्यों और मृत शरीरों को सही तरीके से न संभालने के मामलों पर भी ध्यान दिया था। इस संबंध में 10 जून को इंडिया टीवी पर एक वीडियो रिपोर्ट दिखाई गई थी।

''इंडिया टीवी ने 10 जून को एक वीडियो रिपोर्ट दिखाई थी। जिसमें रोगियों की दयनीय स्थिति दिखाई गई थी। मृत शरीर लाॅबी, वेटिंग एरिया, वार्डों में पड़े थे ... यह एक सरकारी अस्पताल की स्थिति थी..''

इससे पहले पूर्व कानून मंत्री व वरिष्ठ अधिवक्ता डाॅक्टर अश्विनी कुमार ने कोर्ट को को एक पत्र लिखा था। जिसमें कोर्ट का ध्यान उन घटनाओं की तरफ खींचा गया था, जिनमें COVID19 से संक्रमित व्यक्तियों के साथ बुरा व्यवहार किया जा रहा है और उनके शवों से भी छेड़छाड़ की जा रही है या उनका ठीक से दाह-संस्कार नहीं करने दिया जा रहा है।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने सीजेआई का ध्यान मध्य प्रदेश में हुई एक दुखद घटना की तरफ भी आकर्षित किया था,जहां COVID से पीड़ित एक बुजुर्ग व्यक्ति को अस्पताल में इसलिए बिस्तर से बांध दिया गया था क्योंकि वह कथित तौर पर इलाज के पैसे नहीं दे पा रहा था।

उन्होंने कहा था कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई मौकों पर ''गरिमा के साथ मरने के अधिकार''को एक मौलिक अधिकार माना है। इसलिए यह न्यायालय का कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि उसके द्वारा घोषित कानून वास्तव में लागू हो।

कुमार ने अपने पत्र में कहा था कि-

''यह अनुरोध किया जाता है कि न्यायालय इस मामले पर स्वतःसंज्ञान ले। गरिमा के मौलिक अधिकार के चैंकाने वाले उल्लंघन के मद्देनजर ... आपकी लाॅर्डशिप से सम्मानपूर्वक अनुरोध किया जाता है, वह इस तरह के आदेश, रिट या अन्य दिशा-निर्देश जारी करे जो नागरिकों के गरिमा के साथ मरने के अधिकार को कार्यान्वित या लागू करवाएं।''

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