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प्रजनन विकल्प चुनने काअधिकार अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक पहलू : केरल हाईकोर्ट ने 14 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के गर्भपात की अनुमति दी

LiveLaw News Network
6 April 2020 4:15 AM GMT
प्रजनन विकल्प चुनने काअधिकार अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक पहलू : केरल हाईकोर्ट ने  14 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के गर्भपात की अनुमति दी
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केरल हाईकोर्ट ने 14 वर्षीय बलात्कार की पीड़िता के 24 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति दे दी है।

इसे ''मुश्किल और निराशाजनक स्थिति'' करार देते हुए,वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से की गई तत्काल सुनवाई के दौरान जस्टिस ए.के जयशंकरन नांबियार और जस्टिस शाजी पी.चेली की खंडपीठ ने यह आदेश दिया है। खंडपीठ ने यह आदेश इस मामले में मेडिकल बोर्ड की राय के आधार पर दिया है, जिसमें कहा गया है कि गर्भावस्था को जारी रखने से किशोर लड़की के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को खतरा हो सकता है।

न्यायालय ने कहा कि प्रजनन विकल्प बनाने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक पहलू है।

अदालत ने कहा,

''... हमारा मानना है कि प्रजनन विकल्प बनाने का 'वाई' का अधिकार उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक पहलू भी है जैसा कि हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत समझा या माना जाता है।

उक्त विकल्प यह तय करने के लिए विस्तारित होगा कि गर्भावस्था को उसके पूर्ण कार्यकाल तक ले जाना है या नहीं। यद्यपि यह अधिकार एमटीपी अधिनियम के तहत लगाए गए प्रतिबंधों के अधीन है। इस मामले में, हमने पाया हैं कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट 'वाई' के फैसले को सही ठहराती है और इसके अलावा, उसके पास गर्भावस्था को समाप्त करने के लिए अपने माता-पिता की सहमति भी है।''

यह आदेश लड़की के पिता द्वारा दायर एक रिट याचिका में पारित किया गया है। लड़की करीब पांच महीने पहले लापता हो गई थी, और उसका पता लगाने के लिए हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई थी। पांच महीने बाद वह मंगलौर में एक 28 वर्षीय विवाहित व्यक्ति के साथ मिली थी। उस व्यक्ति को आईपीसी और पाॅक्सो के तहत अपराध करने के मामले में गिरफ्तार कर लिया गया है।

चूंकि गर्भावस्था की अवधि 20 सप्ताह से ज्यादा हो गई थी। जबकि कानूनी रूप से गर्भपात कराने के लिए वैध निर्धारित अवधि बीस सप्ताह तक है। इसलिए लड़की के पिता ने अधिवक्ता रजित के माध्यम से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

मामले की तात्कालिकता को ध्यान में रखते हुए, पीठ ने निर्देश दिया कि नाबालिग लड़की के स्वास्थ्य पर गर्भावस्था के जोखिम के बारे में रिपोर्ट देने के लिए एक दिन के भीतर ही एक मेडिकल बोर्ड का गठन किया जाए।

मेडिकल बोर्ड ने कहा कि 14 साल की उम्र में गर्भावस्था को जारी रखना निश्चित रूप से गर्भवती महिला के जीवन को जोखिम में डालता है क्योंकि ''गर्भावधि उच्च रक्तचाप, एनीमिया, ऑपरेटिव डिलीवरी का जोखिम और प्रसूति रक्तस्राव सहित प्रसूति की सभी जटिलताओं का काफी जोखिम है।''

मेडिकल बोर्ड ने यह भी कहा कि रोगी में भावनात्मक रूप से अस्थिर व्यक्तित्व के लक्षण आने की संभावना है और ''एक माँ बनने के लिए जिस परिपक्वता की आवश्यकता होती है''वो इस लड़की में प्रतीत नहीं हुई। इसलिए, गर्भावस्था को जारी रखने से मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों का जोखिम भी जुड़ा हुआ है।

मामले की स्थिति के बारे में दोबारा सुनिश्चित होने के लिए, पीठ ने मेडिकल कॉलेज अस्पताल, त्रिचूर के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की प्रमुख व प्रोफेसर डॉ. अंबुजम.के, के साथ वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बातचीत की, जो खुद मेडिकल बोर्ड की एक सदस्य भी थी।

न्यायालय ने कहा कि

''इस मामले में अगर 'वाई' को 14 वर्ष की आयु में उसकी गर्भावस्था को जारी रखने की अनुमति दी जाती है तो इससे उसके जीवन के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी पर्याप्त जोखिम हैं। यह भी स्पष्ट है कि एक भावी मां बनने के लिए जिस परिपक्वता की आवश्यकता होती है,वो भी 'वाई' में नहीं है। किसी भी सूरत में वह अपनी गर्भावस्था के साथ जारी नहीं रखना चाहती है।

जहां तक उसके बच्चे की बात है, तो चिकित्सकों का मानना है कि किशोरावस्था में गर्भधारण होने के कारण बच्चे में शारीरिक और मानसिक असामान्यताओं का काफी खतरा रहता है। समान रूप से, यदि बच्चा इस स्तर पर गर्भावस्था की समाप्ति से समय बच जाता है, तो भी बच्चे को गंभीर रूप से विकलांग करने के लिए शारीरिक और मानसिक असामान्यताओं का पर्याप्त जोखिम होगा।''

पीठ ने इसके बाद मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट 1971 की धारा 5 पर ध्यान दिया। जिसमें कहा गया कि गर्भावस्था की कानूनी रूप से समाप्ति के लिए धारा 3 के तहत निर्धारित 20 सप्ताह की अधिकतम अवधि ,उन मामलों में लागू नहीं होगी जहां गर्भपात किसी ''गर्भवती महिला का जीवन बचाने के लिए तुरंत आवश्यक है।''

न्यायमूर्ति चेली ने फैसले में कहा कि

"ऊपर वर्णित अधिनियम 1971 के प्रावधानों का गहन विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि एमटीपी अधिनियम, 1971 की धारा 5 (1) अधिनियम की धारा 3 का एक अपवाद है। इसलिए अधिनियम की धारा 3 के तहत गर्भावस्था को समाप्त करने के लिए निर्धारित सीमा की अधिकतम अवधि के बावजूद भी धारा 5 के तहत निर्दिष्ट असाधारण परिस्थितियों में गर्भावस्था को समाप्त किया जा सकता है। इस मामले की परिस्थितियों में, मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए, यह स्पष्ट है कि 'वाई' के जीवन के लिए गंभीर मानसिक और शारीरिक खतरा है।''

गर्भावस्था की समाप्ति की प्रक्रिया की अनुमति देते समय अदालत ने डॉक्टरों को निर्देश दिया है कि वह भ्रूण के टिशू रख लें ताकि उसकी डीएनए पहचान की जा सकें। साथ ही आरोपी व्यक्ति के खिलाफ लंबित आपराधिक मामले को देखते हुए इनको भविष्य के उद्देश्यों के लिए भी बरकरार रखने का निर्देश दिया है। हालांकि, मेडिकल रिपोर्ट में संकेत दिए गए हैं कि इस बात की भी संभावना है कि गर्भावस्था की चिकित्सकीय समाप्ति के समय बच्चा जिंदा रह जाए।

इस पर ध्यान देते हुए, न्यायालय ने कहा कि

''यदि गर्भावस्था की चिकित्सकीय समाप्ति के प्रयासों के बावजूद, बच्चा जीवित रह जाता है, तो डॉक्टर यह सुनिश्चित करेंगे कि इस बच्चे के लिए वह सब कुछ किया जाए जो इन परिस्थितियों में संभव व साध्य हो और ऐसे मामलों के लिए कानून के तहत निर्धारित हो। ताकि वह स्वस्थ बच्चे के रूप में विकसित हो सकें।''



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