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'बोलने की स्वतंत्रता का अधिकार धार्मिक भावनाओं को आहत करने का लाइसेंस नहीं': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अयोध्या राम मंदिर के खिलाफ दुष्प्रचार करने के आरोपी पीएफआई सदस्य को अग्रिम जमानत देने से इनकार किया

LiveLaw News Network
7 April 2021 5:57 AM GMT
बोलने की स्वतंत्रता का अधिकार धार्मिक भावनाओं को आहत करने का लाइसेंस नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अयोध्या राम मंदिर के खिलाफ दुष्प्रचार करने के आरोपी पीएफआई सदस्य को अग्रिम जमानत देने से इनकार किया
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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास समारोह के खिलाफ दुष्प्रचार करके दो धार्मिक समुदायों के बीच दुश्मनी को बढ़ाने के आरोपी को अग्रिम जमानत देने से इनकार किया।

न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह की एकल पीठ ने कहा कि,

"धर्मनिरपेक्ष राज्य में लोगों को प्राप्त भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार, नागरिकों की धार्मिक भावनाओं और विश्वासों और आस्था को चोट पहुंचाने का पूर्ण लाइसेंस नहीं है।"

बेंच ने देखा कि अभियुक्त मोहम्मद नदीम के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है।

बेंच ने आगे कहा कि,

"जो व्यक्ति निन्दात्मक संदेशों के दुष्प्रचार का जोखिम उठाता है, वह न्यायालय के विवेक को अपने फेवर में लाने का हकदार नहीं है।"

पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के सक्रिय सदस्य नदीम को यूपी पुलिस ने धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी बढ़ाने के आरोप में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 153-ए के तहत मामला दर्ज किया था।

शिकायतकर्ता के अनुसार नदीम यह दुष्प्रचार कर रहा था कि अयोध्या में मंदिर का शिलान्यास समारोह मस्जिद की भूमि पर किया जा रहा है, इसलिए बाबरी मस्जिद के स्थल की सुरक्षा के लिए हर मुसलमान को आगे आना होगा।

एफआईआर में आगे आरोप लगाया गया है कि इस दुष्प्रचार के कारण दो समुदायों के बीच सांप्रदायिक तनाव की संभावना है और सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ सकता है और सार्वजनिक शांति भंग हो सकती है।

कोर्ट को अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता ने अग्रिम जमानत याचिका का विरोध करते हुए सूचित किया कि जांच के दौरान आरोपी के खिलाफ आरोपित सबूत पाए गए हैं। यह भी तर्क दिया गया कि एफआईआर में कथित अपराध की निष्पक्ष जांच करने के लिए आरोपी को हिरासत में लेकर पूछताछ करने की आवश्यकता है।

एकल न्यायाधीश ने एफआईआर को ध्यान में रखते हुए कहा कि आरोपी नदीम के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है। यह देखा गया कि प्राथमिकी से पता चलता है कि आरोपी कथित रूप से प्रसार कर रहा था और दो धार्मिक समुदायों के बीच दुश्मनी और घृणा की भावना को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा था।

कोर्ट ने आदेश में कहा कि,

"वर्तमान मामले में आवेदक द्वारा एक धर्म या समुदाय के संबंध में की गई टिप्पणी / प्रचार एक समुदाय या समूह को दूसरे समुदाय के खिलाफ उकसाने में सक्षम है। इसलिए प्रथम दृष्टया यह कृत्य भारतीय दंड संहिता की धारा 153 ए के तहत दंडनीय अपराध है।"

दूसरी ओर आरोपी नदीम ने दावा किया कि प्राथमिकी में लगाए गए सभी आरोप झूठे हैं और वह कुछ भी नहीं बल्कि पुलिस कर्मियों की गलती और अनधिकृत हिरासत द्वारा की गई अवैधता को कवर करने का प्रयास है।

केस का शीर्षक: मोहम्मद नदीम बनाम यूपी राज्य

आदेश की कॉपी यहां पढ़ें:




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