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राजस्थान हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री से कहा, अगर पीड़ित को पक्षकार नहीं बनाया गया है तो एससी/एसटी अधिनियम के तहत कोई अपील दर्ज करने पर विचार न करे

LiveLaw News Network
27 July 2020 10:37 AM GMT
राजस्थान हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री से कहा, अगर पीड़ित को पक्षकार नहीं बनाया गया है तो एससी/एसटी अधिनियम के तहत कोई अपील दर्ज करने पर विचार न करे
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राजस्थान हाईकोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री से कहा है कि अगर एससी/एसटी (अत्याचार उन्मूलन) अधिनियम के तहत किसी मामले में पीड़ित को प्रतिवादी-पक्षकार नहीं बनाया गया है तो ऐसी अपील दर्ज करने के लिए उस पर विचार न करे।

न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने यह आदेश अधिनियम की धारा 15(3) और 15(5) के तहत पीड़ित को आरोपी के ख़िलाफ़ ज़मानत या रिहाई जैसी किसी भी तरह की सुनवाई के दौरान मौजूद रहने के अधिकार के तहत दिया है।

अदालत ने अधिनियम की धारा 14A के तहत दायर एक अपील पर सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया। इस अपील में विशेष जज के आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें आरोपी-अपीलकर्ता की ज़मानत याचिका सीआरपीसी की धारा 439 के तहत रद्द कर दी गई थी।

पीठ ने कहा,

"एससी/एसटी अधिनियम के तहत ज़मानत नहीं देने के आदेश के ख़िलाफ़ दायर अपील पर सुनवाई पीड़ित/शिकायतकर्ता की अदालत में मौजूदगी की सूचना के बिना नहीं हो सकती।"

उसने अपीलकर्ता को निर्देश दिया है कि वह शिकायतकर्ता/पीड़ित को इस मामले में पक्षकार-प्रतिवादी के रूप में शामिल करे और अब इस मामले की अगली सुनवाई 29 जुलाई को होगी।

हाल में कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी इसी तरह के मामले को लेकर विस्तृत निर्देश दिया।

अदालत ने कहा, "…अदालत को ज़मानत याचिका सहित किसी भी तरह की सुनवाई में पीड़ित या उसके आश्रितों की राय को सुनने का मौक़ा देना ही होगा।"

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा था कि एससी/एसटी अधिनियम के तहत "पीड़ित" में उस व्यक्ति के मां-बाप और परिवार के सदस्य भी हो सकते हैं जिनके ख़िलाफ़ अपराध हुआ है।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस प्रावधान के संदर्भ में निम्नलिखित निर्देश दिया था -

"अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 15-A इस अधिनियम के तहत होनेवाली सुनवाई में पीड़ित या उसके उसके आश्रितों को सुनवाई में शामिल होने का अधिकार देता है। इसलिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 15-A की उपधारा 5 के तहत इस मामले की सुनवाई में पीड़ित या उसके आश्रित/प्रथम सूचना देनेवाले/शिकायतकर्ता/पीड़ित या उसके आश्रित को इस मामले में पक्षकार बनाया जाना आवश्यक है।

एससी/एसटी अधिनियम के तहत मामले की सुनवाई करने वाली विशेष अदालत ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश देकर पीड़ित या उसके आश्रितों/प्रथम सूचना देनेवाले/शिकायतकर्ता को अपने पैनल से वक़ील मुहैया कराएगी।

केस का विवरण :

केस : श्रीपाल सिंह एवं अन्या बनाम राज्य

केस नंबर : आपराधिक अपील नम्बर 542/2020

कोरम : न्यायमूर्ति संदीप मेहता

आदेश की प्रति डाउनलोड करेंं



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