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कानून उन लोगों की मदद करता है, जो अपने अधिकारों के प्रति सतर्क रहते हैं: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

Shahadat
24 Jun 2022 7:23 AM GMT
कानून उन लोगों की मदद करता है, जो अपने अधिकारों के प्रति सतर्क रहते हैं: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट
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पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में दोहराया कि कानून उन लोगों की मदद करता है जो अपने अधिकारों के बारे में सतर्क हैं, न कि उन लोगों की जो इससे बेखबर हैं।

जस्टिस जीएस संधावालिया और जस्टिस विकास सूरी की खंडपीठ ने आगे कहा कि विलंबित चरण में उठाए जाने वाले स्वीकृति, देरी और लापरवाही अच्छी तरह से मान्यता प्राप्त अपवाद है, जो दावे को खारिज करने के लिए पर्याप्य आधार हैं।

इस मामले में रिट याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि उनके पास मेडिकल डिग्री चाहने वाले छात्रों को शिक्षा प्रदान करने के लिए मेडिकल/डेंटल कॉलेजों में समायोजित होने के लिए आवश्यक योग्यता है। एकल न्यायाधीश ने रिट याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट रूप से देखा कि रिट याचिकाकर्ताओं ने उचित समय के भीतर आक्षेपित आदेश को कभी चुनौती नहीं दी।

अदालत ने माना कि रिट याचिकाकर्ता वादियों के साथ पूर्ण समानता की मांग नहीं कर सकते। उन्होंने वर्ष 2013 में समय पर रिट कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, क्योंकि कानून उन लोगों की मदद करता है, जो खुद की मदद करते हैं और उन लोगों के बचाव में नहीं आते हैं, जो अपने अधिकारों के प्रति लापरवाह रहते हैं।

अदालत ने कहा कि न्यायशास्त्र के अनुसार, प्रयोज्यता इस बात पर निर्भर करती है कि निर्णय का विषय नीतिगत मामलों को छूता है या नहीं।

न्यायशास्त्र में उक्त सिद्धांत की प्रयोज्यता इस तथ्य पर भी निर्भर करेगी कि क्या निर्णय की विषय वस्तु नीतिगत मामलों को प्रभावित करती है अर्थात व्यक्तियों के एक वर्ग को प्रभावित करती है।

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य बनाम अरविंद कुमार श्रीवास्तव और अन्य, (2015) 1 एससीसी 347 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा किया, जिसमें यह माना गया कि जिन लोगों ने गलत कार्रवाई को चुनौती नहीं दी और केवल इसलिए कि उनके समकक्ष अपने प्रयासों में सफल हुए, यह दावा नहीं कर सकते कि निर्णय का लाभ दिया गया है। हालांकि, यह अपवाद उन मामलों में लागू नहीं हो सकता, जहां सभी समान रूप से स्थित व्यक्तियों को लाभ देने के इरादे से निर्णय दिया गया था।

कोर्ट ने यूपी में सुप्रीम कोर्ट के जल निगम और एक अन्य बनाम जसवंत सिंह और दूसरा, (2006) 11 एससीसी 464, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह माना गया कि जब भी ऐसा प्रतीत होता है कि दावेदारों ने समय गंवा दिया तो अदालत को राहत देने में धीमा होना चाहिए।

जहां तक वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों का संबंध है, अदालत ने कहा कि अपीलकर्ताओं ने इस बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया कि आरटीआई के तहत सूचना देने के बाद भी उन्हें न्यायिक समीक्षा की मांग करने से किसने रोका।

अपीलकर्ताओं ने इस न्यायालय के समक्ष भी कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया कि आरटीआई के तहत सूचना प्रस्तुत करने के बाद भी उन्हें न्यायिक समीक्षा की मांग करने से किसने रोका, जैसा कि कुछ अन्य समान रूप से स्थित व्यक्तियों द्वारा किया गया था।

एकल न्यायाधीश द्वारा यह सही ठहराया गया कि यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि अपीलकर्ता उन आदेशों से अवगत नहीं थे, क्योंकि प्रभावित पक्ष ने पहले ही रिट याचिका दायर कर दी और अंतरिम रोक प्राप्त कर ली है। उक्त स्थगन आदेश रिट याचिकाकर्ताओं पर लागू नहीं था।

उपरोक्त चर्चा को देखते हुए अदालत ने आंशिक रूप से इंट्रा-कोर्ट अपील और लेटर्स पेटेंट अपील की अनुमति दी। कोर्ट ने रिट याचिका को खारिज करने वाले आक्षेपित निर्णय को भी रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह कहते हुए कि यह रिट याचिकाकर्ताओं के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता है, खासकर जब उनके अधिकारों को प्रभावित करतने वाली पॉलिसी रिट कोर्ट की जांच के अधीन हो, जैसाकि 'जगन जोत और अन्य बनाम पंजाब राज्य और अन्य' कहा गया है।

केस टाइटल: डॉ. संगीता अग्रवाल और अन्य बनाम पंजाब राज्य और अन्य

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