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पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने संरक्षण याचिका में संस्कार समारोह की तस्वीरें संलग्न करने पर जताई आपत्ति, रजिस्ट्री को दिए निर्देश

SPARSH UPADHYAY
15 Jun 2020 10:04 AM GMT
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने संरक्षण याचिका में संस्कार समारोह की तस्वीरें संलग्न करने पर जताई आपत्ति, रजिस्ट्री को दिए निर्देश
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पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने हाईकोर्ट रजिस्ट्री को निर्देशित किया है कि भागे हुए जोड़ों (Runaway Couples) द्वारा दायर संरक्षण याचिकाओं (Protection Plea) के साथ संस्कार के समारोह की तस्वीरें संलग्न नहीं की जाएंगी, जब तक कि वकील का इस सम्बन्ध में एक हलफनामा न हो कि तस्वीरें मामले को समझने के लिए आवश्यक हैं, जिसके लिए आवेदन के माध्यम से कारण सौंपा जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति राजीव नारायण रैना की एकल पीठ ने रजिस्ट्री को यह निर्देश, एक ऐसे ही याचिकाकर्ता दंपत्ति द्वारा दाखिल संरक्षण याचिका पर दिया, जिन्होंने अपने माता-पिता की इच्छा के खिलाफ शादी की और इसके पश्च्यात उन्होंने अपने जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट से संपर्क किया।

अदालत ने मामले में पुलिस कमिश्नर, जालंधर, पंजाब को आदेश दिया कि वे याचिकाकर्ता की सुरक्षा के अनुरूप कदम उठायें।

ये निर्देश, लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 2006 (3) आरसीआर (आपराधिक) 870 के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय दिशा-निर्देश के अनुरूप दिए गए।

अदालत ने यह कहा कि याचिकाकर्ता जोड़ा, अपना प्रतिनिधित्व पेश करने के लिए स्वतंत्र है, ताकि प्रभावी कदम उठाए जा सकें।

अदालत ने संस्कार समारोह की तस्वीरें संग्लाग्न करने पर जोर देने का कारण रजिस्ट्री से पूछा था

दरअसल, जब यह मामला 11-जून-2020 को सुनवाई के लिए अदालत के समक्ष आया था, तो अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील से यह पूछा था कि याचिका के साथ समारोह की तस्वीरें संलग्न करने की क्या आवश्यकता थी, जबकि संस्कार करने वाला व्यक्ति तस्वीर में मौजूद नहीं था और न ही अदालत भागे हुए दंपत्ति द्वारा दायर संरक्षण याचिका में ऐसी तस्वीरें देखने की इच्छुक होती है?

इसपर अधिवक्ता द्वारा अदालत को बताया गया कि अगर तस्वीरों को रिकॉर्ड पर नहीं रखा जाता है तो रजिस्ट्री आपत्ति जताती है। अदालत ने इस बात पर गौर करते हुए कि समान याचिकाओं में ऐसी ही तस्वीरें बड़ी संख्या में संलग्न की जाती हैं, रजिस्ट्री को नोटिस जारी किया था।

रजिस्ट्री ने अपने जवाब में अदालत को बताया था कि ऐसी याचिकाओं में यदि तस्वीरें संलग्न नहीं की जाती तो रजिस्ट्री कोई आपत्ति नहीं उठाती है। लेकिन, यदि याचिकाकर्ता द्वारा तस्वीरें संलग्न की जाती हैं और वे पर्याप्त या स्पष्ट नहीं दिखाई देती हैं, तो रजिस्ट्री द्वारा आपत्ति जताई जाती है।

इस विषय पर हाईकोर्ट ने कहा कि इन याचिकाओं से अधिशेष को हटाने और उन्हें न्यूनतम रखने के लिए निर्देश जारी करने की आवश्यकता है।

अदालत ने रजिस्ट्री को निर्देश देते हुए कहा कि,

"रजिस्ट्री, जोड़ों की तस्वीरों के सबूत या शादी के सबूत के रूप में युक्त किसी भी अनुलग्नक पर विचार करना बंद कर देगी और आवश्यकता के लिए एक हलफनामे की मांग करेगी, यह बताते हुए कि वे (अनुलग्नक/तस्वीरें) किस उद्देश्य से याचिका की प्रार्थना के लिए महत्वपूर्ण हैं। तस्वीरें विवाह का प्रमाण नहीं हैं, और न ही यह न्यायालय विवाह से संबंधित कोई न्यायालय है। न्यायालय केवल इन मामलों में याचिकाकर्ताओं की पहचान के बारे में चिंतित होता है, जिसे ट्रेस किया जा सकता है।"

अदालत ने यह भी निर्देश दिए कि आवश्यकता (Necessity) के एक हलफनामे की मांग वकील से [याचिकाकर्ता से नहीं] की जाएगी, क्योंकि वकील ही अपने क्लाइंट को सलाह देते हैं कि याचिकाओं की प्रस्तुति के लिए क्या कदम उठाये जाएं।

अदालत ने याचिका की न्यूनतम आवश्यकता पर दिया जोर

अदालत ने अपने आदेश में इस बात को रेखांकित किया कि इन याचिकाओं के इर्द-गिर्द एक उद्योग विकसित हो गया है और समय आ गया है कि इन याचिकाओं को फरियादियों की बुनियादी माँगों के अनुरूप बनाया जाए। अदालत ने कहा कि भागे हुए दंपत्ति, जो वास्तव में यह मानते हैं कि उन्हें उच्च न्यायालय से विवाह प्रमाणपत्र मिलेगा, के वित्तीय खर्च पर इन याचिकाओं से निपटना कोई खुशी की बात नहीं है।

अदालत ने आगे कहा कि

"यह प्रथा बंद होने के योग्य है, क्योंकि यह उच्च न्यायालय और उसके कर्मचारियों के ऊपर याचिका दाखिल होने के चरण से लेकर आदेश को अपलोड करने तक एक बड़ा बोझ बनती है।"

अदालत ने आगे यह भी कहा कि, न्यायालय की इन तस्वीरों को देखने में कोई दिलचस्पी नहीं होती है, और यह बेंच के ध्यान को आकर्षित करती हैं और अनावश्यक टिप्पणियों को आमंत्रित करती हैं, जिससे न्यायलय का समय समय बर्बाद होता है।

अदालत ने आगे कहा था कि, यह डायवर्सन, अक्सर मामले को एक गतिरोध में बदल देता है, जब केवल एक सरल दिशानिर्देश की मांग की जाती है जिसे यांत्रिक रूप से भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के आधार पर जारी किया जाता है, ताकि युवा जोड़ों को नाराज माता-पिता और उनके परिवारों को शादी का विरोध करने के चलते पहुंचाए जाने वाले संकट और शारीरिक नुकसान से बचाया जा सके।

भागे हुए जोड़ों द्वारा दर्ज किए गए मामलों की बड़ी संख्या को देखते हुए, हाईकोर्ट ने मुख्य रूप से यह भी कहा कि विधायिका इस ओर भी सोच सकती है कि अन्य फोरम जैसे कि निचली अदालतों द्वारा इन मामलों की सुनवाई की जाए।

अदालत ने स्पष्ट किया कि

"यह अदालत को ऐसे मामले के भार से मुक्त करने का सुझाव मात्र है। यह विधायिका के लिए वह समाधान खोजे, यदि यह आवश्यक हो या उचित हो।"

आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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