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पुलिस अधिकारियों को लोगों से बहुत गालियां मिलती हैं, उनका काम प्रशंसा और सम्मान के लायकः कलकत्ता हाईकोर्ट

Manisha Khatri
24 Jan 2023 1:45 PM GMT
पुलिस अधिकारियों को लोगों से बहुत गालियां मिलती हैं, उनका काम प्रशंसा और सम्मान के लायकः कलकत्ता हाईकोर्ट
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Calcutta High Court

कलकत्ता हाईकोर्ट ने मंगलवार को कहा कि पुलिस अधिकारियों को लोगों से काफी गालियां मिलती हैं लेकिन उनका काम सराहना और प्रशंसा का पात्र है ताकि वे प्रभावी ढंग से और अधिक सेवा करने के लिए प्रेरित हो पाएं।

जस्टिस शम्पा दत्त (पॉल) की खंडपीठ ने यह भी कहा कि पुलिस अधिकारी जो कठिन और खतरनाक काम करते हैं, उन पर किसी का ध्यान नहीं जाता है या कम से कम उन्हें पहचाना नहीं जाता है और ज्यादातर लोग वास्तव में यह नहीं सोचते हैं कि पुलिस उनके समुदाय में हर दिन क्या करती है जब तक कि उन्हें उनसे किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता न पड़े।

कोर्ट ने कहा,

‘‘वर्दी जनता को विश्वास देती है, हालांकि वे भी इंसान हैं, भावनात्मक रूप से प्रतिक्रिया कर सकते हैं। यदि आप उनके साथ सम्मान के साथ व्यवहार करते हैं, तो वे बदले में अच्छा जवाब देंगे। अधिकारियों को उन लोगों से बहुत अधिक गालियां मिलती हैं जो उन्हें नहीं जानते हैं और बस पुलिस को पसंद नहीं करते हैं। थोड़ा सा सम्मान दिखाने से बहुत मदद मिलेगी। लेकिन कानून द्वारा दी गई शक्ति का दुरुपयोग हो सकता है, जिस पर लोग कभी-कभी सही प्रतिक्रिया देते हैं। हालांकि पुलिस अधिकारियों द्वारा दैनिक जीवन में की जाने वाली कड़ी मेहनत और बलिदानों को भूलना आसान है। सभी को प्रशंसा और सम्मान पसंद है, पुलिस कुछ अलग नहीं है। उनका काम प्रशंसा और स्वीकृति के योग्य है ताकि वे और अधिक प्रभावी ढंग से सेवा करने के लिए प्रेरित हो पाएं।’’

अदालत ने बनमालीपुर पुलिस क्वार्टर की छत पर पटाखे चलाने, पुलिस अधिकारियों के सार्वजनिक कर्तव्य करने में बाधा डालने और उनके साथ मारपीट करने के आरोपी 4 व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार करते हुए ये टिप्पणियां की हैं।

अदालत ने कहा कि पुलिस कर्मियों ने शोर और फायर को रोकने की मांग की थी क्योंकि ऐसा न केवल निवासियों के लिए बल्कि आग से दुर्घटना होने पर जानमाल के नुकसान को बचाने के लिए भी जरूरी था,जिसे याचिकाकर्ता देख नहीं पा रहे थे।

याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कार्यवाही को रद्द करने से इनकार करते हुए अदालत ने यह भी कहा कि आरोपों में वास्तविकता है और सामग्री प्रथम दृष्टया एक संज्ञेय अपराध में आवेदकों की मिलीभगत को दर्शाती है, जो सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है और इस तरह अदालत ने कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया।

संक्षेप में मामला

अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, अक्टूबर 2017 में काली पूजा के दौरान चारों याचिकाकर्ता (जिनमें से 3 कॉलेज जाने वाले छात्र हैं और एक 11वीं कक्षा का छात्र है) एक पुलिस क्वार्टर की छत पर पटाखे चला रहे थे और जब उन्हें ऐसा करने से रोका गया, तो उन्होंने पांच पुलिस कर्मियों पर हमला किया और उन्हें अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन करने से रोका।

यह आगे आरोप लगाया गया है कि भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 186/353/323/285/286/34 के तहत बुक किए गए याचिकाकर्ताओं/अभियुक्तों को चॉकलेट बम के दो बक्से (जिसमें एक बॉक्स में 24 पीस थे ) और 10 पैकेट कालीपटका (प्रत्येक में 14 पीस थे) के साथ पकड़ा गया था।

दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं का मामला यह है कि वे चॉकलेट बम का उपयोग नहीं कर रहे थे और केवल काली पूजा मना रहे थे और अचानक पुलिस कर्मी वहां आए और उनके साथ मारपीट की, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें चोटें आईं। इसलिए उन्हें अस्पताल में इलाज कराना पड़ा। यह भी कहा गया कि यह झूठे आरोप लगाने का मामला है।

न्यायालय की टिप्पणियां

मामले में उपस्थित परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि कथित अपराधों की सामग्री प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता के खिलाफ संज्ञेय अपराध का गठन करती है और इस प्रकार यह कहा गया कि इस मामले की कार्यवाही को न्याय के हित में रद्द नहीं किया जाना चाहिए।

अदालत ने कहा,

‘‘ऐसी प्रकृति की कार्यवाही को रद्द करना जहां प्रथम सामग्री है, कानून/अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और समाज को एक बहुत ही गलत संदेश देगा क्योंकि इस मामले में रक्षक (कानून में) न्याय मांग कर रहे हैं।’’

मामले में कार्यवाही को रद्द करने से इनकार करते हुए अदालत ने कहा कि,

‘‘वर्तमान में, इस न्यायालय के समक्ष एकमात्र सामग्री में केस डायरी व चार्जशीट है और इस स्तर पर स्पष्ट निष्कर्ष पर आना जल्दबाजी होगा। केस डायरी और चार्जशीट की सामग्री याचिकाकर्ताओं/अभियुक्तों के खिलाफ एक संज्ञेय अपराध बनाती है और याचिकाकर्ताओं/अभियुक्तों के खिलाफ सुनवाई के लिए आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त सामग्री है। इसलिए अदालत की अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग किसी वैध अभियोजन (सुप्रीम कोर्ट के शब्दों में) को रोकने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।’’

कोर्ट ने यह भी कहा कि स्थानीय पुलिस विभाग को धन्यवाद देने के कई कारण हैं और यहां उनमें से कुछ इस प्रकार हैंः-

(ए) अनिश्चित और खतरनाक काम और कर्तव्य। हमारे समुदाय के किसी भी खतरनाक तत्वों से हमें बचाने के लिए हर दिन पुलिस अधिकारी स्टेशन छोड़ देते हैं। वह खुद को ऐसी खतरनाक स्थितियों में डालते हैं जिसमें उन्हें चोट लग सकती है या वे मारे भी जा सकते हैं-यह सब कुछ सार्वजनिक सुरक्षा के नाम पर किया जाता है। यह कोई ऐसा काम नहीं है जिसे करने के लिए बहुत से लोग इच्छुक होंगे, और यह दुख की बात है कि हम में से बहुत से लोग उस अच्छे काम को नजरअंदाज कर देते हैं जो पुलिस दैनिक आधार पर करती है। जबकि हम लगातार उनमें, उनकी सेवा और उनके विभागों में दोष निकालते रहते हैं, जबकि हम स्वयं पूर्णता से दूर होते हैं। एक व्यक्ति में अच्छे और बुरे गुणों को एक साथ रखा जाता है, यह तब होता है जब संतुलन बुरे की तरफ झुक जाता है, तब कार्रवाई करने की आवश्यकता होती है, तब तक वर्दी में रहने वाले इन व्यक्तियों की अच्छाई को स्वीकार करना चाहिए और इनका सम्मान किया जाना चाहिए।

(बी) वे लगातार बुरे का सामना करते हैं, ताकि हम कभी-कभी खुद से भी सुरक्षित रह सकें (जब हम अपने हित के खिलाफ काम करते हैं, उदाहरण - लापरवाही से गाड़ी चलाना, आत्महत्या करने का प्रयास करना)। पुलिस अधिकारी हमारे समाज में हर समय परेशान लोगों से निपटते हैं। यह शारीरिक या मानसिक रूप से आसान नहीं है, लेकिन अपने कर्तव्य के दौरान और अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए यह किया जाता है, जिसे हम सभी करने के लिए तरसते हैं। पुलिस को अपने आसपास देखकर हम सुरक्षित महसूस करते हैं, हालांकि सभी वर्ग में अपवाद (बहुत दुर्लभ) हैं। उनका काम शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से थका देने वाला होता है और उन्हें उनके काम के अनुपात में उतना मुआवजा नहीं दिया जाता है यहां तक कि उतनी सुविधाओं भी नहीं मिलती हैं।

प्रतिनिधित्व-

याचिकाकर्ताओं के वकील- मो. साबिर अहमद, मो. अब्दुर रकीब, श्री बिस्वजीत सरकार, श्री धीमान बनर्जी

राज्य के लिए वकील- सुश्री रीता दत्ता

केस टाइटल - श्री ऋतुराज सेन व अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य व अन्य,सीआरआर 534/2019

आदेश पढ़ने/डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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