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दिल्‍ली हाईकोर्ट ने कहा, पूर्वाग्रह का आरोप लगाने के मामलों में पीड़ित पक्ष को पूर्वाग्रह की मौजूदगी के उचित कारण साबित करना भर पर्याप्त

LiveLaw News Network
4 Dec 2019 9:52 AM GMT
दिल्‍ली हाईकोर्ट ने कहा, पूर्वाग्रह का आरोप लगाने के मामलों में पीड़ित पक्ष को पूर्वाग्रह की मौजूदगी के उचित कारण साबित करना भर पर्याप्त
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Party Alleging Bias Need To Show Only Reasonable Likelihood Of Its Existence And Not Absolute Proof : Delhi HC

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को एयर फोर्स बाल भारती स्कूल के उप-प्राचार्य की नियुक्ति को, पूर्वाग्रहों की पर्याप्त संभावना के कारण चयन प्रक्रिया में भ्रष्‍टाचार होने के आधार पर, रद्द कर दिया।

जस्टिस सी हरि शंकर की एकल पीठ ने कल्पना मेहदीरत्ता बनाम एय फोर्स बाल भारती स्कूल में मामले में ये फैसला सुनाया।

मामला ये था कि वाइस प्रिंसिपल के चयन के लिए विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) में प्रिंसिपल (प्रतिवादी 5) की भागीदारी ने प्रक्रिया भ्रष्ट कर दिया, क्योंकि वो प‌िछले प्रिंसिपल के साथ " सीधी मुकदमेबाजी" में शामिल रह चुकी थी।

याचिकाकर्ता कल्पना मेहदीरत्ता का मामला ये था कि उन्होंने 2013 में वाइस प्रिंस‌िपल पद के लिए आवेदन किया था, जिसमें प्रतिवादी नंबर 5 की सिफारिश की गई थी और चुना गया। इसके बाद उन्होंने प्रतिवादी नंबर 5 को वाइस प्रिंसिपल पद पर नियुक्त किए जाने के डीपीसी के फैसले को चुनौती दी। इसी बीच में प्रतिवादी नंबर 5 को प्र‌िंसिपल के पद पर पदोन्नत किया गया। याचिकाकर्ता ने इस पदोन्नति को भी चुनौती दी।

उपरोक्त मुकदमे के प्रक्रिया के दौर में ही, 2015 में स्कूल द्वारा एक और अधिसूचना जारी कर वाइस प्रिंसिपल पद के लिए आवेदन मंगाए गए। याचिकाकर्ता ने चयन प्रक्रिया में हिस्‍सा लिया, लेकिन कथित तौर पर डीपीसी के पक्षपात के कारण असफल रही।

ये दलील दी गई कि डीपीसी में प्रतिवादी नंबर 5 शामिल थीं, जो याचिकाकर्ता के खिलाफ शत्रुवत व्यवहार की रही हैं। इसके अलावा, इसमें 2013 डीपीस के सदस्य भी शामिल हैं, जिनके आदेश को याचिकाकर्ता ने चुनौती दी हुई है।

अदालत ने कहा कि एड‌मिनेस्ट्रट‌िव अथॉरिटी के पूर्वाग्रह को मानते हुए, जिसने अपनी आधिकारिक क्षमता से निर्णय लिया था और जिस पर कोर्ट में सवाल उठा, वो दूरगामी था, ये सहमति योग्‍य है कि सेलेक्‍शन पैनल में प्रतिवादी नंबर 5 की उपस्थिति से पूर्वाग्रह की बू आ रही थी।

"अगर एक एडमिनीस्ट्रेटिव अथॉरिटी, जिसने अपनी आधिकारिक क्षमता से निर्णय लिया है, उस पर कोर्ट में सवाल उठता है, वो भी मात्र पूर्वाग्रह के कारण तो ये मान लिया जाए कि अविश्वसनीयता टूटने की सीमा तक खींच चुकी है।

इस तथ्य को देखते हुए कि याचिकाकर्ता ने प्रतिवादी नंबर 5 के साथ डीपीसी द्वारा वाइस-प्रिंसिपल के पदोन्नति के लिए आयोजित इंटरव्यू में प्र‌तिस्पर्धा में थी, और बाद में प्रतिवादी नंबर 5 का प्र‌िंसिपल के रूप में प्रमोशन हो गया, और साधारण मानवीय आचरण पर गौर किया जाए तो कोर्ट की राय है कि प्र‌तिवादी नंबर 5 को याचिकाकर्ता के खिलाफ पूर्वाग्रह रखने का उचित आधार मौजूद है। "

जस्टिस हरी शंकर ने कहा कि पक्षपात के आरोप लगाने वाली पार्टी को पूर्वाग्रह का पूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आत्मगत पूर्वाग्रह को ठोस सबूतों के द्वारा सिद्ध किया जाना मुश्किल है और इस प्रकार, पक्षपात की आशंका जता रही पार्टी को केवल पक्षपात होने की उचित संभावना साबित करने की जरूरत है।

"पूर्वाग्रह मन की अवस्‍था को दर्शाता है, और इस‌लिए इसे स्‍थापित करना, निश्चित रूप से बहुत ही कठिन कार्य है। यही कारण है कि जहां पूर्वाग्रह का आरोप लगाया गया है, वहां कानूनी की आवश्यकता अनुसार सबुतों की डिग्री कुछ हद तक कम कर दी जाती है, पूर्वाग्रह साबित करने के लिए पूर्ण प्रमाण की नहीं, पूर्वाग्रह की मौजूदगी की ठोस संभावना की आवश्यकता होती है। यह कहते हुए कि, पूर्वाग्रह की संभावना "वास्तविक" होनी चाहिए, और इसकी आशंका, "वाजिब" होनी चाहिए।

मामले की सुनवाई में एस पार्थसारथी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, (1974) 3 एससीसी 459 केस का हवाला दिया गया। कोर्ट ने वाइस प्र‌िंसिपल की की नियुक्ति को रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता के आवेदन पर पुनर्विचार करने के लिए रिव्यू डीपीसी का आदेश दिया।

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