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विवाहित बेटे की मौत पर माता-पिता मोटर वाहन अधिनियम के तहत फिलियल कंसोर्टियम के रूप में मुआवज़े का दावा नहीं कर सकते : बॉम्बे हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
7 Jan 2020 10:00 AM GMT
विवाहित बेटे की मौत पर माता-पिता मोटर वाहन अधिनियम के तहत फिलियल कंसोर्टियम के रूप में मुआवज़े का दावा नहीं कर सकते :  बॉम्बे हाईकोर्ट
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने शुक्रवार को माना कि एक विवाहित बेटे के माता-पिता मोटर वाहन अधिनियम के तहत सहायक संघ (फिलियल कंसोर्टियम ) के रूप में मुआवजे का दावा करने के हकदार नहीं हैं।

मोटर दुर्घटना दावा ट्रिब्यूनल सोलापुर के आदेश को आंशिक रूप से संशोधित करते हुए न्यायमूर्ति आर.डी धानुका की एकल-न्यायाधीश पीठ ने मृतक के माता-पिता को सहायक संघ के लिए दी गई मुआवजे की राशि पर रोक लगा दी और कहा,

''जहां तक प्रतिवादी नंबर 1 से 5 द्वारा फिलियल कंसोर्टियम (सहायक संघ) के लिए दावा करने का संबंध है, मेरे विचार में चूंकि मृतक अपनी मृत्यु के समय कुंवारा नहीं था, इसलिए माता-पिता किसी भी सहायक संघ के दावे के हकदार नहीं होगें।''

''मैग्मा जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम नानू राम उर्फ चुहरु राम एंड अन्य,एआईआर 2018 एससी 892''के मामले का हवाला दिया गया। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि केवल उन मामलों में जहां माता-पिता ने अपने नाबालिग बच्चे को खोया है, या अविवाहित पुत्र या पुत्री को खोया है, माता-पिता फिलियल कंसोर्टियम के रूप में हुए नुकसान के लिए मुआवजे के हकदार होंगे।

शीर्ष कोर्ट ने कहा था कि-

''बच्चे की आकस्मिक मृत्यु के मामले में संतानीय सहायक संघ के तहत मुआवज़ा माता-पिता का अधिकार है। एक दुर्घटना में एक बच्चे की मौत हो जाने से उसके माता-पिता और परिवार के लोगों को बहुत झटका लगता है और मृतक के परिवार को बहुत दुख होता है। माता-पिता के लिए सबसे बड़ा दुख यह होता है कि उन्होंने अपने जीवनकाल के दौरान अपने बच्चे को खो दिया है। ऐसे मामलों में बच्चों को उनके प्यार, स्नेह, साहचर्य और परिवार इकाई में उनकी भूमिका के लिए महत्व दिया जाता है।

मोटर वाहन अधिनियम वास्तविक दावों के मामलों में पीड़ितों या उनके परिवारों को राहत प्रदान करने के उद्देश्य से एक लाभदायक कानून है।

ऐसे मामले में जहां एक माता-पिता ने अपने नाबालिग बच्चे, या अविवाहित बेटे या बेटी को खो दिया है, माता-पिता फिलियल कंसोर्टियम के तहत नुकसान की भरपाई पाने के हकदार हैं।''

मृतक एक कृषक और दूध विक्रेता था, जब वह अपनी बाइक चला रहा था, तभी एक लापरवाही से चलाई जा रही मारुति वैन ने उसे टक्कर मार दी। बीमा कंपनी ने कहा कि घटना के लिए मृतक की तरफ से बरती गई लापरवाही भी जिम्मेदार है। इसलिए बीमा कंपनी ने मृतक के परिवार को मुआवजा देने से इनकार कर दिया था।

यह मानते हुए कि दुर्घटना में मृतक की कोई गलती नहीं है, ट्रिब्यूनल ने उनके परिवार को मुआवजा दिया था, जिनके लिए सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी एंड अदर्स,एआईआर 2017 एससी 5157 मामले में अनुमति दी थी।

उक्त आदेश को सही ठहराते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने मृतक के परिवार की आय का पता लगाने के लिए मृतक के पूरे संयुक्त परिवार की आय को चार भागों में विभाजित करके सही किया था।

इसके अलावा यह माना गया कि कृषि आय के मामले में निर्भरता की गणना कर्मचारी के वेतन या स्वरोजगार जैसे आय के नियमित साधनों की तरह नहीं की जा सकत।

हाईकोर्ट ने ''हरियाणा राज्य व अन्य बनाम जसबीर कौर और अन्य, (2003) 7 एससीसी 484'' के मामले सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए फैसले का हवाला दिया, जिसमें माना गया था कि किसान की मृत्यु के मामले में, उसके उत्तराधिकारियों को कृषि भूमि मिल जाती हैं और उससे उपज प्राप्त कर सकते हैं। वारिसों का एकमात्र नुकसान यह है कि मृतक के बजाय किसी और से खेती के काम करवाना होगा या व्यक्तिगत रूप से भूमि पर खेती करने की आवश्यकता होती है।

हाईकोर्ट ने कहा कि

''कृषक की मृत्यु के मामले में उत्तराधिकारियों की हानि यह है कि उन्हें भूमि की खेती के लिए किसी अन्य व्यक्ति की सहायता लेने की आवश्यकता होती है या इस काम के लिए रखना पड़ता है। इस प्रकार, अन्य व्यक्ति पर किया जाने वाला खर्च या पारिश्रमिक वास्तव में नुकसान है या इसे निर्भरता कहा जा सकता है।''

मामले का विवरण-

केस का शीर्षक-इफको टोकियो जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम ज्योति अजय अवतडे एंड अन्य।

केस नं- एफए नंबर 1239/2016

कोरम- न्यायमूर्ति आरडी धानुका

प्रतिनिधित्व-एडवोकेट अभिजीत.पी.कुलकर्णी(अपीलकर्ता के लिए),एडवोकेट आर.एस अलंगे के साथ एडवोकेट अजीत.वी अलंगे (प्रतिवादियों के लिए)


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